शायरी ने दिखाया सियासत को आईना: बशीर बद्र का वह शेर, जो शिमला से जुड़ गया

शायरी ने दिखाया सियासत को आईना: बशीर बद्र का वह शेर, जो शिमला से जुड़ गया
शायरी ने दिखाया सियासत को आईना: बशीर बद्र का वह शेर, जो शिमला से जुड़ गया
विनोद भावुक। शिमला
शिमला की पहाड़ियां सिर्फ़ ठंडी हवा और अंग्रेज़ी विरासत के लिए नहीं जानी जातीं। कभी-कभी यहीं से ऐसी शायरी भी सुनाई दी, जो सरहदों से बड़ी हो गई। 1971 के भारत- पाक युद्ध के बाद 1972 का साल था, जब भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक शिमला समझौता हुआ। एक तरफ राजनीति अपने शब्द चुन रही थी और उसी वक्त उर्दू अदब में एक शेर लिखा गया, जिसके शायर थे बशीर बद्र।
बशीर बद्र का यह शेर शिमला से जुड़ गया। यह शेर सिर्फ़ शायरी भर नहीं थी, इतना असरदार था कि यह शिमला समझौते की आत्मा बन गया। भारत- पाक समझौते के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने बशीर बद्र के ई शेर को उद्धृत किया।
‘दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं, तो शर्मिंदा न हों।‘
समझौता हुआ और शेर अमर हो गया
शिमला समझौता केवल कूटनीति नहीं थी। यह एक कोशिश थी कि दुश्मनी के बाद भी इंसानियत बची रहे। यही बात बशीर बद्र की शायरी की पहचान है। वे अपनी शायरी में मोहब्बत के साथ विवेक, विरोध के साथ संवेदना और राजनीति के बीच इंसानियत की वकालत करते हैं। बशीर बद्र ने अपनी शायरी को आम आदमी की ज़ुबान दी।
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में पैदा हुये बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए पीएचडी की डिग्री ली और उर्दू ग़ज़ल में बड़ा मुकाम हासिल किया। प्रेम, दर्शन, और जीवन उनकी शायरी के विषय हैं। बशीर बद्र उन शायरों में हैं, जिनके शेर मुशायरों से निकलकर रेडियो, सिनेमा और संसद तक पहुंचे।
शब्दों के सिवाय सब जल गया
साल 1987, मेरठ सांप्रदायिक दंगे। घर जला, किताबें जलीं। वर्षों की अप्रकाशित रचनाएं नष्ट हो गईं, लेकिन आदमी की यादें और उसके शब्द कोई आग नहीं जला सकती। इसके बाद बशीर बद्र भोपाल चले गए और उनकी शायरी पहले से ज़्यादा इंसानी हो गई।1999 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू) और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
90 साल के बशीर बद्र डिमेंशिया से पीड़ित हैं और अपने मुशायरे के दौर को भूल चुके हैं, लेकिन उनके कई शेर देश की जुबां पर हैं। उनका यह शेर आज भी उतना ही जीवित है।
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’
शिमला के नाम एक साहित्यिक सच
शिमला ने भारत- पाक के बीच सिर्फ समझौता ही नहीं करवाया, एक शेर को भी इतिहास में दर्ज कर दिया। अगर कभी शिमला की किसी शाम में आपको सियासत और शायरी एक साथ महसूस हो, तो याद रखिएगा कि यह वही शहर है जहां, एक शेर ने दुश्मनी को इंसानियत सिखाई थी।
बात बशीर बद्र के उस शेर की, जो भारतीय राजनीति में शेर संसद तक पहुंचा। दशकों बाद भी इस शेर को भाजपा दिगज्ज नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसे दोहराते रहे हैं।
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Jyoti maurya

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