आज़ादी से पहले की कशमकश: भारत संघ में शामिल होने को लेकर दुविधा में थे मंडी और सिरमौर रियासतों के महाराज, माउंटबेटन से की थी मुलाकात, ‘पहाड़ी संघ’ का था विचार

आज़ादी से पहले की कशमकश: भारत संघ में शामिल होने को लेकर दुविधा में थे मंडी और सिरमौर रियासतों के महाराज, माउंटबेटन से की थी मुलाकात, ‘पहाड़ी संघ’ का था विचार
आज़ादी से पहले की कशमकश: भारत संघ में शामिल होने को लेकर दुविधा में थे मंडी और सिरमौर रियासतों के महाराज, माउंटबेटन से की थी मुलाकात, ‘पहाड़ी संघ’ का था विचार
विनोद भावुक। मंडी
आजाद भारत में संघीय ढांचे का निर्माण सहज प्रक्रिया नहीं थी। यह राजनीतिक संवाद, दबाव, कूटनीति और दूरदर्शिता का परिणाम था। आज़ादी केवल ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति नहीं थी, यह भारत के राजनीतिक नक्शे को एक सूत्र में पिरोने का भी निर्णायक कालखंड था। उस दौर में मंडी और सिरमौर रियासत ऐतिहासिक कशमकश को लेखक प्रशांत पोल ने अपनी पुस्तक में एक खबर की तरह पेश किया है।
प्रशांत पोल की पुस्तक ‘वे पंद्रह दिन (1 अगस्त, 1947 से 15 अगस्त, 1947 के निर्णायक दिनों की गाथा)’ आजादी के पहले के दो सप्ताह के हर राजनीतिक घटनाक्रम को रिपोर्ट करती है। इसी में एक चैप्टर मंडी और सिरमौर रियासत को लेकर है। बेशक इन रियासतों ने भारत संघ में विलय का मार्ग चुना, लेकिन शुरू में इन पहाड़ी रियासतों के शासक भारत में शामिल होने को लेकर दुविधा में थे।
विलय किया जाए या आजाद रहें
1947 का अगस्त। ब्रिटिश सत्ता का सूर्य अस्ताचल की ओर था, लेकिन पहाड़ों में राजनीतिक तापमान चरम पर था। हिमालय की गोद में बसी मंडी रियासत और सिरमौर राज्य उस समय एक बड़े संवैधानिक द्वंद्व से गुजर रहे थे। उनके लिए सबसे बड़ी कशमकश यह थी कि क्या भारत संघ में विलय किया जाए या स्वतंत्र पहचान बनाए रखी जाए?
15 अगस्त नजदीक था। ब्रिटिश भारत के साथ-साथ 560 से अधिक रियासतों के सामने भी विकल्प स्पष्ट था इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (विलीनीकरण संधि) पर हस्ताक्षर कर भारत या पाकिस्तान में शामिल हों, या फिर स्वतंत्र रहने का जोखिम उठाएं। मंडी और सिरमौर रियासतों के शासकों के मन में यह विचार उभरा कि अंग्रेजी शासन से मुक्ति के बाद वे अपनी संप्रभुता बनाए रखें।
‘पहाड़ी संघ’ : सत्ता- संरचना बनाए रखने की रणनीति
उधर यह खबर भी थी कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा भी स्वतंत्र रहने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। ऐसे में मंडी और सिरमौर के शासकों ने एक ‘हिल स्टेट्स फेडरेशन’ यानी पहाड़ी राज्यों का संघ बनाने की संभावनाएँ टटोलीं, जिसमें जम्मू-कश्मीर, पंजाब के पर्वतीय क्षेत्र और शिमला पहाड़ शामिल हों। यह एक प्रकार से क्षेत्रीय संघवाद की परिकल्पना थी।
एक सामूहिक सुरक्षा और राजनीतिक अस्तित्व की रणनीति। राजनीतिक शब्दों में कहें तो यह ‘स्वायत्त राज्य की अवधारणा’ थी। एक ऐसा मॉडल, जिसमें वे भारत संघ का हिस्सा बने बिना अपनी सत्ता-संरचना कायम रखें। हालांकि छोटी-छोटी रियासतों की स्वतंत्रता अंततः व्यावहारिक नहीं थी। आर्थिक, सामरिक और प्रशासनिक दृष्टि से वे बड़े संघीय ढाँचे के बिना टिक नहीं सकती थीं।
राजाओं ने की माउंटबेटन से मुलाकात
दोनों रियासतों के शासकों ने इस प्रस्ताव पर विचार के लिए समय मांगने के लिए वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन से भेंट की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि फिलहाल भारत में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर संभव नहीं हैं। माउंटबेटन के लिए यह स्थिति जटिल थी। जितनी अधिक रियासतें स्वतंत्रता का दावा, सत्ता-हस्तांतरण उतना ही पेचीदा। ब्रिटिश प्रशासन के लिए यह राजनीतिक अस्थिरता का संकेत था।
3 अगस्त 1947 की दोपहर, माउंटबेटन ने इस विषय में भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखा। पत्र में आग्रह था कि मंडी और सिरमौर को निर्णय के लिए थोड़ा और समय दिया जाए। परंतु इतिहास गवाह है कि सरदार पटेल और वी.पी. मेनन की ‘एक राष्ट्र, एक संघीय ढांचा’ रणनीति स्पष्ट थी और उस पर काम कर रहे थे।
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Jyoti maurya

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