राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम्’ पर हिमाचल प्रदेश से लगे थे अभद्रता के आरोप, विवाद से चर्चित हुई फिल्म, म्यूजिक से चरम पर पहुंची लोकप्रियता

राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम्’ पर हिमाचल प्रदेश से लगे थे अभद्रता के आरोप, विवाद से चर्चित हुई फिल्म, म्यूजिक से चरम पर पहुंची लोकप्रियता
राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम शिवम सुन्दरम्’ पर हिमाचल प्रदेश से लगे थे अभद्रता के आरोप, विवाद से चर्चित हुई फिल्म, म्यूजिक से चरम पर पहुंची लोकप्रियता
विनोद भावुक। धर्मशाला
1978 में रिलीज़ हुई बॉलीवुड की चर्चित फिल्म ‘सत्यम शिवं सुन्दरम’ केवल अपनी प्रेम कहानी और संगीत के लिए ही नहीं, बल्कि विवाद और सेंसरशिप के मामले के कारण भी चर्चा में रही। राज कपूर द्वारा निर्देशित और शशि कपूर तथा ज़ीनत अमान की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म शारीरिक और आध्यात्मिक प्रेम के बीच अंतर पर केंद्रित थी।
फिल्म में ज़ीनत अमान की नग्नता और संवेदनशील दृश्य प्रस्तुत किए गए थे, जिससे फिल्म अभद्रता के आरोपों का सामना करने लगी। हिमाचल प्रदेश के एक व्यक्ति लक्ष्मण ने फिल्म के खिलाफ आईपीसी की धारा 292 के तहत मामला दायर किया। उनका कहना था कि धार्मिक शीर्षक ‘सत्यम शिवं सुन्दरम्’ के साथ इस तरह के दृश्य दिखाना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत
राज कपूर ने इस नोटिस का विरोध किया और मामला हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुंचा। उच्च न्यायालय शिमला ने हस्तक्षेप नहीं किया और अंततः सुप्रीम कोर्ट में यह मामला गया। निदेशक के लिए राहत भरी बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने राज कपूर के पक्ष में निर्णय दिया और मामला खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सिनेमा प्रमाणन बोर्ड ने फिल्म को प्रमाणित कर दिया है, तो निर्माता सुरक्षा के दायरे में आता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कलात्मक अभिव्यक्ति और प्रगतिशील कला को पुराने औसत और रूढ़िवादी मानदंडों से रोकना उचित नहीं। न्यायमूर्ति अय्यर के इस फैसले ने भारत में कलात्मक स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण मिसाल कायम की।
फिल्म का संगीत और लोकप्रियता
हालांकि विवादों ने फिल्म को और चर्चित किया। लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल के संगीत ने फिल्म की लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया। लता मंगेशकर, मुकेश, और मन्ना डे जैसे संगीतकारों की आवाज़ ने गीतों को अमर कर दिया। फिल्म का टाइटल सॉन्ग ‘सत्यम शिवम सुन्दरम्’ आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।
‘सत्यम शिवम सुन्दरम्’ न केवल एक प्रेम कहानी है, बल्कि यह सेंसरशिप, कलात्मक स्वतंत्रता और भारतीय न्याय प्रणाली के दृष्टिकोण का प्रतीक भी बन गई। इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि कला और नैतिकता के बीच संतुलन हमेशा संवाद और विवेक के माध्यम से तय किया जा सकता है।
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Jyoti maurya

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