पढ़िये कैसे कुल्लू की शांत वादियों ने बीमार और कमजोर कनाडाई युवती में पैदा की थी जीने की तरंग? 45 साल बाद फेसबुक पोस्ट से ताज़ा हुई यादें

पढ़िये कैसे कुल्लू की शांत वादियों ने बीमार और कमजोर कनाडाई युवती में पैदा की थी जीने की तरंग? 45 साल बाद फेसबुक पोस्ट से ताज़ा हुई यादें
पढ़िये कैसे कुल्लू की शांत वादियों ने बीमार और कमजोर कनाडाई युवती में पैदा की थी जीने की तरंग? 45 साल बाद फेसबुक पोस्ट से ताज़ा हुई यादें
विनोद भावुक। हिमाचल बिज़नेस
हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, एक एहसास है और इस एहसास की गवाही देती है लिलियन वैन वीलडन की कहानी। एक साधारण-सी कनाडाई युवती, जो साल 1979 में कुल्लू घाटी में घूमने आई और देवभूमि ने उसकी थकी हुई आत्मा को फिर से जगा दिया। उसमें जीने की तरंग पैदा हो गई।
45 साल पहले, लिलियन भारत की यात्रा पर थीं। थकान, कमजोरी, भूख न लगने के कारण वह बेहद कमजोर थीं। उसका वजन 40 किलो से भी कम था। कुल्लू की यात्रा उसके लिए चमत्कार बन गई।
कुल्लू की नदियां- नाले, देवदार के जंगल और गांवों के रास्ते उनके लिए दवाई बन गए।
कुल्लू की तस्वीर अपलोड की तो सामने आई कहानी
लिलियन लिखती हैं, मैं इतनी कमजोर थी कि कभी-कभी खड़ी भी मुश्किल से हो पाती थी, लेकिन कुल्लू घाटी में रहकर खुश थी। यहां की हवा, शांति, प्रकृति, सब मुझे जीवित महसूस करा रहे थे। लिलियन का बॉयफ्रेंड उनकी तस्वीरें खींचता, और लिलियन उन पलों को बस जीती जातीं।
45 साल बाद लिलियन ने हाल ही में ‘60s, 70s & 80s Trails to India’ नामक फेसबुक ग्रुप में अपने ट्रैवल एल्बम की एक पुरानी फोटो साझा की। कुल्लू घाटी की इस तस्वीर में एक पहाड़ी लड़की किल्टे में घास ला रही है। उसके एक हाथ में उसकी टूटी हुई चप्पल है।
तस्वीर पर चर्चा, भावनाओं का विस्फोट
इस फोटो पर आए कुछ कमेंट्स उसे चुभ गए। यहीं से शुरू हुआ इमोशनल स्टॉर्म। पुरानी यादें, बीमारी, यात्रा, सब मिलकर अचानक भावनाओं का विस्फोट बन गईं। उन्होंने झट से लिखा, क्या इसे डिलीट कर दूं? उनके मैसेज में नाराज़गी कम और गलतफहमी से आई चोट ज्यादा थी।
कुछ देर बाद जब गलतफहमी दूर हुई तो वह खेद जताते हुये लिखा कि अगली बार सही तरह पोस्ट करूंगी। इसी कमेन्ट से माहौल फिर से हल्का हो गया। सोशल मीडिया पर एक फोटो को लेकर शुरू हुये कमेन्ट के सिलसिले से फोटो ग्लोबल लेबल पर वायरल हो गई।
हिमालय खुद करता है हीलिंग
लिलियन की कहानी का सबसे सुंदर हिस्सा यह है कि कमजोरी, सुस्ती, 45 किलो वजन और बीमारी के बावजूद कुल्लू की धरती ने उन्हें मुस्कुराना सिखाया। कुल्लू घाटी की मिट्टी ने उनके भीतर एक नई ऊर्जा भरी थी।
45 साल बाद जब उन्होंने यह फोटो साझा की, तो दुनिया को फिर से उनकी कहानी जानने का मौका मिला। कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह कि हिमालय खुद हीलिंग करता है। लिलियन आज भी वैंकूवर में रहती हैं, लेकिन कुल्लू ने उनके दिल में हमेशा के लिए एक घर बना लिया है।

Jyoti maurya

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