इतिहास में दर्ज : कांगड़ा के इतिहास के प्रोफेसर बिपिन चंद्र, जिनके लेक्चर सुनने के लिए डीयू और जेएनयू में दूसरे सब्जेक्ट्स के स्टूडेंट्स भी रहते थे लालायित
इतिहास में दर्ज : कांगड़ा के इतिहास के प्रोफेसर बिपिन चंद्र, जिनके लेक्चर सुनने के लिए डीयू और जेएनयू में दूसरे सब्जेक्ट्स के स्टूडेंट्स भी रहते थे लालायित
विनोद भावुक/ धर्मशाला
दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू के इतिहास में दर्ज है कि जब इतिहास के एक प्रोफेसर स्टूडेंट्स को इतिहास पढ़ाते थे, तो पूरा क्लासरूम स्टूडेंट्स से खचाखच भरा रहता। इतिहास को परत दर परत खोलने का सलीका ऐसा कि दूसरे सब्जेक्ट्स के स्टूडेंट्स भी अक्सर गलियारे में खड़े होकर उनके व्याख्यान सुनते पाए जाते थे। उन्होंने 43 वर्षों के शिक्षण करियर में कई पीढ़ियों के स्टूडेंट्स को इतिहास पढ़ाया और एक उत्साही और समर्पित शिक्षक के तौर पर स्टूडेंट्स के बीच लोकप्रिय रहे।
रोचक, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कहानियों के प्लेटफॉर्म ‘हिमाचल बिजनेस’ पर बात हिमाचल प्रदेश की उस प्रतिभा की, जिनका नाम देश के अग्रणी बुद्धिजीवियों में शुमार है। इतिहास के प्रोफेसर के रूप में उनकी शोहरत ऐसी रही कि विषयवस्तु से ओतप्रोत और विचारों से भरपूर उनके व्याख्यान घंटों लंबी और गहन चर्चाओं का कारण बन जाते थे। स्टूडेंट्स के साथ क्लासरूम से शुरू हुई इतिहास की चर्चा कभी कॉफ़ी हाउस तो कभी उनके आवास तक चलती थी।
कांगड़ा का स्टूडेंट, अमेरिका से पढ़ाई
14 मई 1928 में अविभाजित पंजाब के कांगड़ा में एक सूद परिवार में जन्मे बिपन चंद्र अपने दोस्तों के बीच बिपन के नाम से मशहूर थे। कांगड़ा से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने लाहौर के फ़ॉर्मन क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की। उन्होंने अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से इतिहास में स्नातकोत्तर की। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से साल 1959 में पीएचडी की डिग्री ली।
बिपन चंद्र ने स्टैनफोर्ड में मार्क्सवाद का अध्ययन शुरू किया और बाद में पूरी गंभीरता और लगन के साथ उसका अनुसरण किया। उन्होंने मार्क्स या मार्क्सवाद को एक कट्टर आस्तिक के रूप में नहीं देखा। अपने एक मौलिक निबंध में उन्होंने तर्क दिया कि मार्क्स का उपनिवेशवाद का विश्लेषण भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जटिलताओं को समझने के लिए पर्याप्त नहीं था।
दिल्ली यूनिवर्सिटी और जेएनयू में अध्यापन
बिपन चंद्र ने 1950 के दशक में दिल्ली के हिंदू कॉलेज से अपने शिक्षण करियर की शुरुआत की। कुछ साल बाद वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग में ट्रांसफर हो गए। 1970 के दशक के शुरू में वे जेएनयू चले गए। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें यूनिवर्सिटी ने प्रोफेसर एमेरिटस नियुक्त किया। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने उन्हें 2007 में राष्ट्रीय प्रोफेसर नियुक्त किया।
विपिन चंद्र साल 1985 में अमृतसर में आयोजित भारतीय इतिहास कांग्रेस के महासचिव थे। वे 2004 से 2012 तक नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे। इस दौरान नेशनल बुक ट्रस्ट ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया। साल 2010 में भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए बिपन को पद्म भूषण से सम्मानित किया। 30 अगस्त 2014 को 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
15 पुस्तकों का लेखन, कई लेख प्रकाशित
बिपन चंद्र ने आधुनिक और समकालीन भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर 15 पुस्तकें और कई लेख लिखे। उनकी डॉक्टरेट की कृति ‘भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद का उदय और विकास’ है, जो 1966 में प्रकाशित हुई थी। 1985 में उन्होंने ‘दीर्घकालिक गतिशीलता: गांधीजी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन’ शीर्षक से एक लंबा निबंध लिखा। इसका संशोधित संस्करण एक मोनोग्राफ के रूप में प्रकाशित हुआ।
बिपन धर्मनिरपेक्षता के समर्थक थे और एक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी, दोनों के रूप में सांप्रदायिकता का विरोध करते थे। उनका मानना था कि देश में सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए सांप्रदायिकता की एक ऐतिहासिक घटना के रूप में सही और वैज्ञानिक समझ ज़रूरी है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आधुनिक भारत में सांप्रदायिकता’ में उन्होंने इसका आलोचनात्मक विश्लेषण किया है।
निडरता से बात कहने का तरीका
The Wire के लिए लिए आलेख में राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक सौरभ बाजपेयी लिखते हैं कि 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के करीब एक पखवाड़े पहले बिपन चंद्र अपनी टीम के साथ केरल में थे। एक व्याख्यान के दौरान खालिस्तान राष्ट्र की मांग करने वाले जरनैल सिंह भिंडरावाले के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने दो टूक कहा, उसका तुरंत सफ़ाया कर दिया जाना चाहिए।
उस वक़्त तक भिंडरावाला एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था और उसके खिलाफ बोलना सरासर जान का खतरा मोल लेना था। बावजूद इसके बिपिन ने बेबाकी से जवाब दिया और अपनी टीम को हिम्मत बंधाते हुए उसकी चिंता को हंसकर टाल दिया।
सरल- सहज भाषा में लिखीं, लाखों में बिकीं
अकादमिक लेखन की दृष्टि से बिपन चंद्र भारत के विश्व बुद्धिजीवी थे। आधुनिक भारतीय इतिहास को लेकर अक्सर ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज की साम्राज्यवादी इतिहास लेखन परंपरा से उनकी बहस होती रही। वे भारत के सबसे लोकप्रिय जन इतिहासकार थे। उनके लिए इतिहास का आम पाठक ही इतिहास का सबसे बड़ा श्रोता था।
बिपन चंद्र ने इतनी सरल और सहज भाषा में किताबें लिखी हैं कि वे सामान्य पढ़े-लिखे व्यक्ति के मन में दिलचस्पी पैदा कर देती हैं। उनकी किताबें लाखों की तादाद में बिकीं हैं। कहा तो यह जाता है कि वे भारतीय राष्ट्र की इतिहास-दृष्टि को तराशने वाले इतिहासकार थे।
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