जरा याद करो कुर्बानी : 14 साल की उम्र में बन गए क्रांतिकारी, लाहौर, रावलपिंडी मुल्तान और धर्मशाला की जेलों में काटी सजा, फ्रीडम फाइटर कामरेड अमीं चंद को गांधी ने भेंट किया था चरखा
जरा याद करो कुर्बानी : 14 साल की उम्र में बन गए क्रांतिकारी, लाहौर, रावलपिंडी मुल्तान और धर्मशाला की जेलों में काटी सजा, फ्रीडम फाइटर कामरेड अमीं चंद को गांधी ने भेंट किया था चरखा
अजय शर्मा। हमीरपुर
देश को आजाद करवाने के लिए 14 साल का एक किशोर क्रांतिकारी बन गया। अंग्रेजों में उन्हें लाहौर, रावलपिंडी मुल्तान और धर्मशाला की जेलों में कैद कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत करने की सजा दी। हमीरपुर के भरेड़ी के फ्रीडम फाइटर कामरेड अमीं चंद की देशभक्ति देखकर महात्मा गांधी ने उन्हें चरखा भेंट किया। उनके परिजनों में वह चरखा आज भी धरोहर के तौर पर संभाल कर रखा है।
अमीं चंद का जन्म 18 मार्च 1916 को हमीरपुर जिला के भरेड़ी क्षेत्र के रिड़ा गांव में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भरेड़ी के स्कूल में हुई। महज़ 14 वर्ष की उम्र में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।
अमृतसर में राष्ट्रीय नेताओं के ओजस्वी भाषणों ने उनके भीतर आज़ादी की ज्वाला जगा दी और वे जल्द ही क्रांतिकारी दल के सक्रिय सदस्य बन गए।
पिस्टोलों के साथ गिरफ्तार, चार साल का कठोर कारावास
लाहौर में क्रांतिकारी टीका राम सुखन के जोशीले भाषणों से प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें अपना गुरु बना लिया। अमीं चंद, याणवी गांव के राम चंद के साथ लाहौर में एक प्रेस में काम करते थे। उस समय देश को आजाद करवाने का संघर्ष चल रहा था। अमी चंद गुप्त रूप से पोस्टर छापकर अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ लोगों को जागरूक करते थे।
लाहौर में ही कुछ पिस्तौलों के साथ उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। इसके बाद उन पर अत्याचारों का वो सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें लाहौर, रावलपिंडी और मुल्तान की जेलों में उन्होंने 1937 से चार साल का कठोर कारावास भोगा। जेल में रहते उनका संपर्क लाला जगत नारायण, ज्ञानी जैल सिंह, प्रताप सिंह कैरों, रणवीर सिंह, कामरेड रामचंद्र, परशुराम और सरला शर्मा जैसे देशभक्त नेताओं से हुआ।
बॉस ने देश छोड़ा, कैद किए गए अमी चंद
1940 में नागपुर में आयोजित फॉरवर्ड ब्लॉक के दूसरे सम्मेलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कामरेड अमी चंद को लाहौर का प्रमुख संगठक नियुक्त किया। 17 जनवरी 1941 को जब नेताजी भेष बदलकर देश से निकले,तो अंग्रेज सरकार कई दिनों तक यह समझ ही नहीं पाई कि वे कहां हैं। इसी दौरान कामरेड अमीं चंद पर पुलिस का शक गहराया।
एक सुबह पुलिस उन्हें हथकड़ी लगाकर थाने ले जा रही थी, तो शोर सुनकर गली-मोहल्ले के लोग उमड़ पड़े। कामरेड अमीं चंद को छोड़ो के नारे गूंजने लगे। हालात इतने उग्र हो गए कि थाने के बाहर खड़ी एक जीप और एक मोटरसाइकिल को भी आग के हवाले कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें रिहा नहीं किया।
भारत छोड़ो आंदोलन में सजा, 1945 में फिर कैद
अमी चंद की माता गंभीर रूप से बीमार थीं, तो उन्होंने पैरोल की अर्जी दी, लेकिन प्रशासन ने अनुमति नहीं दी। कुछ दिनों बाद माता का निधन हो गया, अकेलेपन और सदमे में पिता का मानसिक संतुलन बिगड़ा और उनका भी देहांत हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद भी कामरेड अमीं चंद के कदम आंदोलन से पीछे नहीं हटे।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें फिर ढाई साल की सजा हुई। 1945 में भरेड़ी के टियाले में भाषण देने पर उन्हें धर्मशाला जेल में बंद कर दिया गया। महात्मा गांधी ने स्वयं कामरेड अमीं चंद को चरखा भेंट किया, जो आज भी उनके परिवार के पास सुरक्षित है। ‘कामरेड’ की उपाधि भी उन्हें गांधी जी ने ही प्रदान की थी, जो उनके विचारों और संघर्ष की पहचान बन गई।
इतिहास में दर्ज कुर्बानी, ओझल हो रहा नाम
देश आजाद हुआ तो 1962 तक वे कांगड़ा जिला कांग्रेस के महासचिव, 1963–67 तक एरिया कमेटी, पंजाब के सदस्य, 1957–58 में भारत सेवक समाज के संगठक चुने गए। 1967 में नादौन से विधायक बने, बाद में विधानसभा के उपाध्यक्ष बने। उन्होंने डॉ. वाई.एस. परमार को विधायक दल के नेता के रूप में प्रस्तावित किया। नादौन, मेवा और बमसन क्षेत्रों के विकास के लिए उन्हें याद किया जाता है।
1976 में पीजीआई चंडीगढ़ में बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। पूर्व शिक्षा मंत्री नारायण चंद्र पराशर ने भरेड़ी स्कूल का नाम उनके नाम पर रखने की घोषणा की थी, लेकिन घोषणा पूरी नहीं हो सकी। त्याग, संघर्ष और निडर देशभक्त कामरेड अमीं चंद की कुर्बानियाँ इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के बावजूद समय के साथ ओझल होती जा रही हैं।
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