कसौली में मच्छरों पर हुई रिसर्च ने एशिया और अफ्रीका में लाखों लोगों की जान बचाने में की मदद, अलेक्ज़ेंडर सिंटन थे मलेरिया के खिलाफ लड़ाई के अग्रदूत
कसौली में मच्छरों पर हुई रिसर्च ने एशिया और अफ्रीका में लाखों लोगों की जान बचाने में की मदद, अलेक्ज़ेंडर सिंटन थे मलेरिया के खिलाफ लड़ाई के अग्रदूत
विनोद भावुक। शिमला
कसौली की ठंडी हवा और देवदार के जंगलों के बीच बैठकर ब्रिटिश ब्रिगेडियर जॉन अलेक्ज़ेंडर सिंटन ने जो शोध किया, उसने भारत ही नहीं, बल्कि एशिया और अफ्रीका में भी लाखों लोगों की जान बचाने में मदद की। सैन्य अधिकारी होते हुये भी अलेक्ज़ेंडर सिंटन मलेरिया के खिलाफ लड़ाई के अग्रदूत रहे। वे विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित एकमात्र वैज्ञानिक थे।
साल 1925 में अलेक्ज़ेंडर सिंटन को भारत में नवगठित सेंट्रल मलेरिया ब्यूरो के अंतर्गत कसौली में मलेरिया सर्वेक्षण का पहला निदेशक नियुक्त किया गया। उस समय कसौली उभरता हुआ वैज्ञानिक केंद्र था। कसौली उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर एसआर क्रिस्टोफर के साथ मिलकर मलेरिया पर शोध किया।
मलेरिया नियंत्रण में कसौली की भूमिका
अलेक्ज़ेंडर सिंटन और एसआर क्रिस्टोफर के नेतृत्व में कसौली में हुये शोध के दौरान मच्छरों की नई प्रजातियों की पहचान हुई। मलेरिया नियंत्रण के आधुनिक उपाय विकसित किए गए और क्विनीन के प्रभाव पर विस्तृत अध्ययन किया गया। मलेरिया विज्ञान में उनका अमिट योगदान आज भी याद किया जाता है।
तीन मच्छर की प्रजातियों एडीज सिंटोनी (Aedes sintoni), एनोफ़ेलीज़ सिंटोनी (Anopheles sintoni) और एनोफ़ेलीज़ सिंटोनोइड्स (Anopheles sintonoides) के नाम उनके नाम पर रखे गए हैं। अलेक्ज़ेंडर सिंटन फ़ेलो ऑफ रॉयल सोसायटी चुने गए, जो विज्ञान जगत का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।
कसौली से सिंटन का निजी रिश्ता
कसौली में ही अलेक्ज़ेंडर सिंटन की मुलाकात एडिथ सेमोर स्टुअर्ट-मार्टिन से हुई, जिनसे उन्होंने 1923 में विवाह किया। उनकी पुत्री एलेनोर इसाबेल मैरी सिंटन का जन्म भी 1924 में कसौली में हुआ। कसौली केवल उनकी प्रयोगशाला और उनका कार्यस्थल नहीं, बल्कि उनके पारिवारिक अध्याय का भी खास पड़ाव बना।
कसौली की वादियां आज भी उस वीर वैज्ञानिक की कहानी सुनाती हैं जिसने युद्धभूमि और प्रयोगशाला दोनों जगह समान साहस दिखाया और मलेरिया से मुक़ाबले के लिए क्रांतिकारी शोध किया। उनके नाम पर कई छात्रावास, चिकित्सा केंद्र और कई वैज्ञानिक नामकरण मौजूद हैं।
उनका विक्टोरिया क्रॉस आर्मी मेडिकल सर्विस म्यूजियम एल्डरशॉट में सुरक्षित है।
युद्धभूमि का नायक, युद्ध के बाद चिकित्सक
प्रथम विश्व युद्ध (1916) के दौरान मेसोपोटामिया में भीषण गोलाबारी के बीच, घायल सैनिकों की सेवा करते हुए उन्हें दोनों हाथों और शरीर में गोलियां लगीं। बावजूद इसके वे युद्ध के मैदान में डटे रहे। इसी असाधारण साहस के लिए उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च वीरता सम्मान विक्टोरिया क्रॉस प्रदान किया गया।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी अलेक्ज़ेंडर सिंटन ने भारत और मध्य-पूर्व में अस्पतालों का नेतृत्व किया और मलेरिया विशेषज्ञ के रूप में सेना की सहायता की। युद्धभूमि का नायक, युद्ध के बाद चिकित्सक के तौर पर उनकी खास पहचान बनी, आज भी जब मच्छरों और मलेरिया पर चर्चा होती है तो कसौली और अलेक्ज़ेंडर सिंटन की याद ताज़ा हो जाती है।
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