रिसर्च : सदियों से देव आस्था के ज़रिए संरक्षित चौहार के देवता हुरंग नारायण का ‘देव उपवन’, लोग खुद करते हैं अपने देवता के जंगल की रक्षा
रिसर्च : सदियों से देव आस्था के ज़रिए संरक्षित चौहार के देवता हुरंग नारायण का ‘देव उपवन’, लोग खुद करते हैं अपने देवता के जंगल की रक्षा
विनोद भावुक। मंडी
जैव विविधता की सुरक्षा में स्थानीय परंपराएं, धार्मिक मान्यताएं और स्थ्नीय समुदाय की सांस्कृतिक प्रथाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह खुलासा चौहार के देवता हुरंग नारायण के पवित्र उपवन की केस स्टडी’ में हुआ है। हुरंग नारायण’ का देव वन एक परंपरागत धार्मिक संरक्षित क्षेत्र है, जिसे सदियों से स्थानीय समुदाय अपनी आस्था और परंपराओं के ज़रिए संरक्षित किए हैं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के डिपार्टमेन्ट ऑफ बायो साइन्सेज के ममता वर्मा और सुरेश कुमार का शोध पत्र ‘जैव विविधता संरक्षण में पारंपरिक विश्वास प्रणाली: हिमाचल प्रदेश में हुरंग नारायण के पवित्र उपवन की केस स्टडी’ जर्नल ऑफ मेडिसनल प्लांट्स स्टडी के वॉल्यूम 13 के 5वें इश्यू में प्रकाशित हुआ है, जो जैव विविधता संरक्षण का अनूठा उदाहरण है।
पवित्र देव वन, रक्षा है कर्तव्य
हूरंग नारायण देव वन एक ऐसा प्राकृतिक क्षेत्र है जहां लोगों को बिना अनुमति प्रवेश नहीं करने दिया जाता। लकड़ी काटने, जड़ी-बूटियां तोड़ने या वन में किसी प्रकार का उपयोग करने पर न सिर्फ सामाजिक बल्कि धार्मिक पाबंदी लागू हैं। मान्यता है कि देवता की शक्ति इन नियमों के पीछे है। इसलिए लोग यह विश्वास रखते हैं कि देवता के वन की रक्षा करना उनका धार्मिक कर्तव्य है।
इस खास पर्वतीय देव वन में वैज्ञानिकों ने 55 विविध पौधों की प्रजातियाँ पाई हैं जिनका उपयोग स्थानीय लोग पारंपरिक उपचारों, औषधियों और दैनिक जीवन के लिए करते हैं। इनमें से कई पौधे दुर्लभ हैं तो कुछ लुप्त या असुरक्षित प्रजातियां हैं। पता चला है कि ऐसे पौधे आसपास के अन्य इलाकों में नहीं पाए जाते, पर देव वन में परंपरागत प्रथाओं की वजह से सुरक्षित हैं।
विज्ञान के दौर में परंपरा का रोल
आधुनिक समय में जैव विविधता संरक्षण केवल सरकारी नियमों से नहीं हो सकता। देवभूमि के पहाड़ों में स्थानीय परंपराएँ और धार्मिक विश्वास प्रकृति की रक्षा का सबसे बड़ा सहारा हैं। स्थानीय लोग देवता के जंगल को भी देवता के ही रूप में मानते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार के नुकसान को पाप मानते हैं और उसे रोकते हैं। इस तरह से जंगल का संरक्षण होता है।
यह अध्ययन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह साबित करता है कि खासकर पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वास प्रकृति संरक्षण के एक प्रभावी रूप हो सकते हैं। हुरंग नारायण देव वन केवल जंगल नहीं, बल्कि एक जीवित संरक्षण प्रणाली, लोक जीवन और सांस्कृतिक विश्वास का प्रतीक है, जहां प्रकृति और इंसान का गहरा सम्बन्ध और संतुलन है।
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