धर्मशाला में रहने वाला लंदन का शांत लड़का ‘ग्रेट गेम’ का सबसे साहसी खिलाड़ी, रॉबर्ट बार्कले शॉ

धर्मशाला में रहने वाला लंदन का शांत लड़का ‘ग्रेट गेम’ का सबसे साहसी खिलाड़ी, रॉबर्ट बार्कले शॉ
धर्मशाला में रहने वाला लंदन का शांत लड़का ‘ग्रेट गेम’ का सबसे साहसी खिलाड़ी, रॉबर्ट बार्कले शॉ
विनोद भावुक। पालमपुर
आज से 146 वर्ष पहले,15 जून 1879 को एक ऐसा अंग्रेज़ व्यापारी दुनिया से विदा हो गया, जिसकी ज़िंदगी चाय, कूटनीति, जासूसी और सिल्क रूट के रोमांचक रहस्यों से बुनी हुई थी। धर्मशाला में रहने वाला रॉबर्ट बार्कले शॉ खनियारा में स्थित चाय बागान का मालिक था, लेकिन उसके मन में दुनिया को पार कर जाने का जूनून था।
लंदन के अप्पर क्लेप्टन की शांत गलियों में 1839 में जन्मा यह लड़का शायद ही जानता था कि एक दिन वह काराकोरम के बर्फीले दर्रों, यारकंद और काशगर जैसे रहस्यमयी शहरों तक पहुंच जाएगा, वो भी तब, जब यूरोप के नक्शों पर ये जगहें धुंधली रेखाओं से अधिक कुछ नहीं थीं।
खनियारा के चाय बागान का मालिक
शॉ की पढ़ाई ट्रिनिटी कॉलेज केंब्रिज से हुई थी। ऐसे लोग लंदन या भारत की किसी शानदार नौकरी में चले जाते थे, पर शॉ को खींच ले गई पहाड़ों की पुकार। वह कांगड़ा आया, खनियारा में चाय बागान खरीदा। वे लद्दाख, यारकंद, काशगर के रस्तों पर चला, जिन्हें यूरोपियों ने देवताओं का क्षेत्र माना था।
1860 के दशक में दो ब्रिटिश यात्री रॉबर्ट शॉ और जॉर्ज हेवर्ड लद्दाख से निकल पड़े। दोनो की मंज़िल थी, चीनी तुर्किस्तान के शहर यारकंद और काशगर। शासन था ताकतवर सेनापति याक़ूब बेग का। दोनों ने अलग-अलग रास्तों से यात्रा की पर कमाल यह कि यारकंद लगभग एक ही दिन पहुँचे।
याक़ूब बेग के दरबार में दस्तक
यारकंद में उनका स्वागत कैद से हुआ। याक़ूब बेग ने दोनों को ‘मेहमान’ के नाम पर महीनों बंद रखा। शॉ की शांत प्रवृत्ति, फलस्तीन और फ़ारसी भाषा का ज्ञान और उसकी सौम्यता ने उसे याक़ूब बेग के दरबार के भीतर पहुंचा दिया, जहां कोई यूरोपीय इससे पहले नहीं पहुंच पाया था।
नई भौगोलिक जानकारी, व्यापार के आंकड़े, राजनीतिक रहस्य और काशगर की सत्ता का अंदरूनी ब्लूप्रिंट लेकर शॉ यारकंद से लौटा। यह ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सोने से भी कीमती था। 1872 में रॉयल जियोग्राफ़िकल सोसायटी ने शॉ को पेट्रनस गोल्ड मेडल दिया।
‘ए विजिट टू हाई टारटरी’
1871 में शॉ की किताब ‘ए विजिट टू हाई टारटरी’ ने शॉ को ब्रिटिश साम्राज्य का सुपरस्टार एक्सप्लोरर बना दिया, पर दुनिया को उसकी चमक बहुत कम देखने को मिली। उनकी सेहत बिगड़ने लगी और 15 जून 1879 को फ्रांस के काँस में 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
रॉबर्ट शॉ ने मध्य एशिया को यूरोपीय विज्ञान से परिचित कराया, चाय के कारोबार के लिए नए द्वार खोले और ब्रिटिश कूटनीति को एक नई दिशा दी। रॉबर्ट शॉ उन लोगों में से था, जिनके लिए जहां नक्शे खत्म हो जाते हैं, वहीं से और इतिहास शुरू होता था।
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Jyoti maurya

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