कालका–शिमला रेलवे के सिख ठेकेदार सरदार बहादुर सर सोभा सिंह, मशोबरा के मशहूर ‘सुंदरवन’ के मालिक
कालका–शिमला रेलवे के सिख ठेकेदार सरदार बहादुर सर सोभा सिंह, मशोबरा के मशहूर ‘सुंदरवन’ के मालिक
विनोद भावुक। शिमला
बेशक सरदार बहादुर सर सोभा सिंह की पहचान भले ही ‘लुटियंस दिल्ली के निर्माता के रूप में अधिक हो, लेकिन शिमला और उसके आसपास के औपनिवेशिक इंफ्रास्ट्रक्चर में भी उनका उतना ही महत्वपूर्ण योगदान रहा। ब्रिटिश राज के दौर में शिमला भारत की प्रयोगशाला था, जहाँ आधुनिकता, इंजीनियरिंग और उद्यमिता नए रूप ले रहे थे। इसी दौर में सरकार बहादुर सोभा सिंह निर्माण की दुनिया के चमकते सितारे थे।
शिमला में वायसराय, वरिष्ठ ब्रिटिश अफ़सर और यूरोपीय इंजीनियर सब एक ही सामाजिक दायरे में घूमते थे। सर सोभा सिंह की सामाजिक प्रतिष्ठा ने उन्हें इन सत्ता के गलियारों तक सीधी पहुँच दिलाई। यही कारण था कि वे केवल ठेकेदार नहीं रहे, निर्णय प्रक्रिया के विश्वसनीय भारतीय चेहरा बने। शिमला जैसे शहर में यह किसी भी भारतीय, विशेषकर सिख के लिए असाधारण उपलब्धि थी।
कालका–शिमला रेलवे के सिख ठेकेदार
1903 में शुरू हुई कालका–शिमला रेलवे लाइन ब्रिटिश सत्ता की जीवनरेखा थी। दुर्गम पहाड़, गहरी खाईयों और तकनीकी चुनौतियों के बीच इस रेल लाइन के निर्माण में सर सोभा सिंह की ठेकेदार की भूमिका निर्णायक रही। इस परियोजना ने उन्हें ब्रिटिश प्रशासन की नज़रों में भरोसेमंद भारतीय उद्यमी के रूप में स्थापित किया। 1935 में सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट कसौली के निर्माण का कांट्रैक्ट उन्हें ही मिला था।
अर्बन हिस्ट्री ऑफ कोलोनियल दिल्ली एंड शिमला, इंडियन रेलवे हिस्ट्री और हिमाचल प्रदेश स्टेट गाइजेटीर्स में सर सोभा सिंह निर्मित ऐतिहासिक परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। देश की आजादी के बाद बने भाखड़ा नांगल डैम, जिसे तत्कालीन प्र्धानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आधुनिक भारत का मंदिर कहा था, इस के ठेकेदार भी सर सोभा सिंह ही थे।
सिख पहचान और आधुनिक भारत
सर सोभा सिंह ने शिमला और दिल्ली दोनों जगह यह सिद्ध किया कि निर्माण भी राष्ट्र निर्माण का मार्ग हो सकता है।उनकी सफलता ने सिख समुदाय को यह आत्मविश्वास दिया कि वे केवल सैन्य या धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं बल्कि आधुनिक भारत के शहरी निर्माता भी हो सकते हैं।
सर सोभा सिंह ने भारतीय ठेकेदारों की वैश्विक विश्वसनीयता दिलवाई। वे सिख समुदाय की सामाजिक-आर्थिक उन्नति के कारक रहे और औपनिवेशिक सत्ता के भीतर भारतीय सहभागिता का उदाहरण बने। वे उन गिने-चुने भारतीयों में थे, जिन्होंने सत्ता से टकराने के बजाय, निर्माण के ज़रिये अपनी जगह बनाई।
मशोबरा का ‘सुंदरवन’
मशोबरा स्थित उनका ‘सुंदरवन’ आवास अपने समय का सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र था। यहां सेब और चेरी के बाग़, टेनिस कोर्ट, बिल्लियर्ड रूम, साइडर प्रेस और संगीत कक्ष था। ‘सुंदरवन’ केवल निजी निवास नहीं था। यह औपनिवेशिक भारत के सिख अभिजात वर्ग की जीवन शैली का प्रतीक था।
18 अप्रैल 1978 को 90 साल की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ। तक उनके बेटे खुशवंत सिंह ने लिखा था कि स्कॉच का लास्ट शिप लेने के एक मिनट बाद उनकी मौत हो गई। इसी के साथ ब्रिटिश भारत से लेकर आजाद भारत के इन्फ्रा निर्माण के एक युग का अंत हो गया, लेकिन वे अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ गए, जिस पर किसी भी भारतीय को गर्व होगा।
नाम पर नहीं कोई सड़क, चौक या इमारत
भारत की राजधानी दिल्ली के पत्थरों में अगर किसी एक व्यक्ति की मेहनत सबसे गहराई से दबी है, तो वह हैं सरदार बहादुर सर सोभा सिंह। उन्होंने अपने नाम पर किसी सड़क, चौक या इमारत का नाम नहीं रखा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी विंडसर पैलेस को शोभा सिंह पैलेस करने का विचार रखा था। दिल्ली विकास प्राधिकरण ने भी संजय लेक के पास सर शोभा सिंह पार्क बनाने की योजना बनाई, लेकिन प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़े।
साल 2006 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने पहला सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर आयोजित किया।
पहला व्याख्यान था ‘माई फादर द बिल्डर’ और वक्ता थे उनके बेटे, प्रसिद्ध लेखक एवं संपादक ख़ुशवंत सिंह। ख़ुशवंत सिंह ने कहा कि आज़ादी के बाद नई दिल्ली बनाने वाले ठेकेदारों, इंजीनियरों और वास्तुकारों को
शायद इसलिए भुला दिया गया, क्योंकि वे सिख थे।
दान की नींव पर खड़ी विरासत
सर सोभा सिंह की असली विरासत ईंट और सीमेंट नहीं, सेवा और संवेदना थी। उन्होंने अपनी संपत्ति
सर शोभा सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिये समाज को लौटा दी। उनका सबसे मानवीय सपना था गुरु तेग बहादुर अस्पताल के पास उन परिवारों के लिए ठहरने की व्यवस्था करना, जो इलाज के दौरान सीढ़ियों पर रातें गुज़ारते थे।
सरकार ने वर्षों तक बात नहीं मानी, लेकिन 5 मार्च 2005 को उनकी जयंती पर पर सर शोभा सिंह धर्मशाला आख़िरकार बन ही गई। सर सोभा सिंह उन लोगों में थे जो इतिहास बनाते हैं, लेकिन इतिहास की तख़्तियों पर नहीं चढ़ते। जिनका नाम इमारतों पर नहीं, बल्कि शहरों की रगों में लिखा होता है। उन्होंने स्मारक नहीं मांगे, समाज को खड़ा कर दिया।
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