सरोजिनी नायडू: शिमला के पहाड़ों में गूंजी ‘भारत कोकिला’ की साहित्य, साहस और संवाद की आवाज
सरोजिनी नायडू: शिमला के पहाड़ों में गूंजी ‘भारत कोकिला’ की साहित्य, साहस और संवाद की आवाज
विनोद भावुक। शिमला
1895 से 1905 तक सरोजिनी नायडू एक कवयित्री के रूप में स्थापित हो गई थी। अंग्रेज़ी में लिखी उनकी कविताएं ब्रिटिश समाज में खूब चर्चित हो चुकी थीं। उनकी यही साहित्यिक पहचान आगे चलकर औपनिवेशिक सत्ता से संवाद का हथियार बनीं। 1915 में सरोजिनी नायडू का राजनीति में प्रवेश हुआ और महात्मा गांधी से मुलाक़ात हुई।
इस मुलाक़ात के बाद उनका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय जुड़ाव हुआ। उनकी जिंदगी में कविता से राजनीति की ओर निर्णायक मोड़ आया। 1919 से 1920 तक शिमला में ब्रिटिश सरकार और भारतीय नेताओं के बीच संवाद का दौर शुरू हुआ। इस दौर में कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडलों में सरोजिनी नायडू की भूमिका प्रभावी हो गई। उन्होंने अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में औपनिवेशिक अधिकारियों के सामने कई बार बेबाक विचार रखे।
स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में महिलाएं
1921 में शिमला में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस नेताओं ने शिमला को अनौपचारिक राजनीतिक केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस की बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं में सरोजिनी नायडू की भागीदारी अहम हो गई। उनकी सक्रिय भूमिका के चलते स्वतंत्रता आंदोलन में देश की महिलाएं अग्रिम पंक्ति में आने लगी। नेशनल आर्काइब ऑफ इंडिया और हिमाचल प्रदेश स्टेट आर्काइब शिमला में उनके भाषणों को संरक्षित किया गया है।
शिमला में हुए संवाद और बैठकों ने नेतृत्व की पृष्ठभूमि तैयार की। 1925 में सरोजिनी नायडू के नाम ऐतिहासिक उपलब्धि जुड़ गई। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 1930 में नमक सत्याग्रह के बाद गांधी की गिरफ़्तारी हुई तो सरोजिनी नायडू ने आंदोलन की बागडोर संभाली। शिमला में उनकी छवि एक सशक्त भारतीय आवाज़ के रूप में स्थापित हुई।
भारत की कोकिला की मजबूत पहचान
1930 के दशक में सरोजिनी नायडू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हो चुकी थी। ब्रिटिश प्रेस और उच्चवर्गीय समाज में उनका खासा प्रभाव हो चुका था। शिमला की सभाओं में उनके भाषण औपनिवेशिक सोच को चुनौती देते रहे। यहीं से उन्हें भारत की कोकिला के तौर पर मजबूत पहचान मिली। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व में बड़े कद्दावर नेत्री के तौर पर स्थापित हुईं।
1947 में भारत में आज़ादी का सूरज उगा और शिमला अब औपनिवेशिक राजधानी नहीं था। 1947–1949 के बीच सरोजिनी नायडू उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनने के साथ ही भारत की पहली महिला राज्यपाल बनी। यह शिमला में सीखे राजनीतिक संवाद और नेतृत्व कौशल का ही प्रतिफल था। शिमला को सत्ता का शहर नहीं, कविता, साहस और संवाद के संगम वाला संवेदनशील राजनीति का मंच बनाया।
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