खोज खबर : सिंधु घाटी में बोली और लिखी जाती थी संस्कृत, भारतीय क्रिप्टोग्राफर का दावा, संस्कृत है सिंधु लिपि की भाषा, 6000 साल पुरानी
खोज खबर : सिंधु घाटी में बोली और लिखी जाती थी संस्कृत, भारतीय क्रिप्टोग्राफर का दावा, संस्कृत है सिंधु लिपि की भाषा, 6000 साल पुरानी
हिमाचल बिजनेस डेस्क। धर्मशाला
दुनिया की सबसे रहस्यमयी प्राचीन लिपियों में से एक, सिंधु घाटी लिपि को पढ़ने का दावा एक भारतीय कूटलेखक यानी एक क्रिप्टोग्राफर ने किया है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो भारतीय इतिहास की कई धारणाएं बदल जाएंगी और आर्य प्रवास सिद्धांत और उत्तर-दक्षिण के विभाजन जैसे आधुनिक मिथकों पर भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
यज्ञदेवम, जिनका असली नाम भारत राव है, एक दुर्लभ क्रिप्टोग्राफर हैं। अभिलेख विशेषज्ञों, पुरातत्वविदों और भाषाविदों की भीड़ में वह एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने सिंधु घाटी लिपि को पढ़ने का दावा किया है। सबसे पुराने मिट्टी के बर्तन जिन पर सिंधु लिपि के प्रतीक मिले हैं, वे 4000 ईसा पूर्व के हैं। तब से इस लिपि को पढ़े जाने की हर कोशिश को नाकाम रही है।
रहस्य बनी हुई है सिंधु लिपि
प्राचीन लिपियों को पढ़ने के लिए द्विभाषी या त्रिभाषी शिलालेखों का सहारा लिया जाता है। मिस्र की चित्रलिपि को पढ़ने वाले शैम्पोलियन को रोसेटा स्टोन से मदद मिली, जिस पर एक ही लेख यूनानी और मिस्री दोनों भाषाओं में लिखा था। हेनरी रॉलिंसन ने ज़ाग्रोस पर्वत में चट्टान पर उकेरे गए त्रिभाषी शिलालेख की मदद से एलामाइट और सुमेरियन लिपियों को पढ़ा।
भारत में ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में इंडो-बैक्ट्रियन राजा अगाथोकल्स के द्विभाषी सिक्के ने मदद की, जिस पर एक तरफ यूनानी और दूसरी तरफ ब्राह्मी में नाम लिखा था। पर सिंधु घाटी के शिलालेखों के साथ ऐसा कोई ‘रोसेटा स्टोन’ नहीं मिला, जहां एक ही संदेश किसी ज्ञात भाषा में भी लिखा हो, इसलिए यह लिपि आज तक रहस्य बनी हुई थी।
आधुनिक सूचना सिद्धांत और यज्ञदेवम की खोज
यज्ञदेवम ने आधुनिक सूचना सिद्धांत के जनक क्लॉड शैनन के 1945 के एक शोध पत्र का सहारा लिया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शैनन को गुप्त कोड को अटूट बनाने का काम दिया गया। उसने पाया कि एक बार पर्याप्त मात्रा में एन्कोडेड संदेश पढ़ लिए जाएं तो सभी कोड तोड़े जा सकते हैं। पर्याप्त पाठ पढ़ लेने से तय हो जाता है कि मिलने वाला हल युनीक होगा।
यज्ञदेवम ने सबसे पहले यह अनुमान लगाया कि सिंधु लिपि की भाषा क्या हो सकती है। उन्होंने ‘संयोजक भाषाओं’ को खारिज कर दिया, जिनमें द्रविड़ भाषाएं और सुमेरियन, एलामाइट, हित्ती जैसी प्राचीन मध्य पूर्वी भाषाएं शामिल हैं। इसका कारण था इन भाषाओं के पैटर्न और सिंधु प्रतीकों के पैटर्न बेमेल थे।
संस्कृत है सिंधु लिपि की भाषा
यज्ञदेवम ने तीन प्रमुख तर्क दिए। सिंधु लिपि में एक ही प्रतीक को लगातार तीन बार दोहराए जाने के मामले मिलते हैं। यह संयोजक भाषाओं में कभी नहीं होता, लेकिन प्राचीन वैदिक संस्कृत में होता है। उदाहरण के लिए ‘जैजज’ जिसका अर्थ है ‘मैंने लड़ाई लड़ी’। संयोजक भाषाओं में दो से अधिक मूल शब्दों से मिलकर बने समास नहीं मिलते।
सिंधु लिपि में ऐसे समास मिलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे संस्कृत में मिलते हैं। संयोजक भाषाओं में उपसर्ग और प्रत्यय ऐसे होते हैं, जो अलग शब्द के रूप में नहीं मिल सकते और निश्चित क्रम में मूल शब्द से जुड़े होते हैं। सिंधु लिपि में उपसर्ग और प्रत्यय अलग शब्दों के रूप में भी मिलते हैं और अलग-अलग शिलालेखों में उनका स्थान बदलता है। यह संस्कृत के अनुरूप है।
यज्ञदेवम के शोध में युनीकनेस
उन्होंने कोड-ब्रेकिंग की विधि अपनाई। सबसे अधिक बार आने वाले प्रतीक की पहचान की, फिर उस प्रतीक के साथ सबसे अधिक बार आने वाले प्रतीक की पहचान की। क्रम में सभी प्रतीकों का अर्थ निर्धारित किया। उन्होंने पाया कि निर्धारित अर्थों से सार्थक शब्द और व्याकरणिक रूप से सही अभिव्यक्तियां बन रही थीं।
उन्होंने इतने शिलालेख पढ़ लिए कि शैनन की युनीकनेस की सीमा को पार कर सकें। यज्ञदेवम ने प्रत्येक सिंधु प्रतीक की तुलना ब्राह्मी के उस प्रतीक से की जो समान ध्वनि उत्पन्न करता है। उनमें भौतिक समानता पाई। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ब्राह्मी लिपि सिंधु लिपि से विकसित हुई है। यदि यज्ञदेवम का दावा सही है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
गलत साबित होता आर्यों का सिद्धांत
यज्ञदेवम के अनुसार, शिलालेखों में देवताओं, हवियों, घोड़ों और भोजन का उल्लेख मिलता है। कुछ संदेशों में लेखक ने लिखा है कि समुद्र उसका घर है। उनका कहना है कि यह सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यापार के पुरातात्विक प्रमाणों और सुमेरियन अभिलेखों की पुष्टि करता है।
आर्य प्रवास सिद्धांत का मुख्य आधार यह है कि 1500 ईसा पूर्व के आसपास स्टेपी क्षेत्रों से आए आक्रमणकारी संस्कृत भारत लाए। फिर उन्होंने अपनी संस्कृति, धर्म और यह भाषा हम पर थोपी। लेकिन यज्ञदेवम की व्याख्या बताती है कि संस्कृत 4000 ईसा पूर्व में न केवल बोली जाती थी, बल्कि लिखी भी जाती थी।
इतिहास की समझ को बदलने वाली खोज
उत्तर-दक्षिण विभाजन का एक हिस्सा आर्य प्रवास सिद्धांत पर टिका है, जो कहता है कि उत्तर भारतीय स्टेपी आक्रमणकारियों के वंशज हैं, जिन्होंने मूल सिंधु घाटी निवासियों को खदेड़ दिया, और ये खदेड़े गए लोग दक्षिण भारतीयों के पूर्वज बने। यज्ञदेवम का अध्ययन हमारी सभ्यता की भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक निरंतरता स्थापित करके इन सिद्धांतों को ध्वस्त करता है।
जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन स्कूल की एसोसिएट प्रोफेसर और इस मूल लेख की लेखिका बृश्टि गुहा के अनुसार, सिंधु घाटी की लिपि को लेकर यह खोज अगर सच साबित होती हैं तो यह हमारे इतिहास की अब तक की समझ को पूरी तरह बदल सकती है। आपकी क्या राय है, अपना पक्ष रखें।
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