सीबे दा युद्धक्षेत्र: पंजाब का कंढी इलाका, जहां छुपा है ‘कुरुक्षेत्र’ जैसा युद्ध मैदान, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की साझा सांस्कृतिक धरोहर
सीबे दा युद्धक्षेत्र: पंजाब का कंढी इलाका, जहां छुपा है ‘कुरुक्षेत्र’ जैसा युद्ध मैदान, पंजाब और हिमाचल प्रदेश की साझा सांस्कृतिक धरोहर
विनोद भावुक। टैटंपालां/ होशियारपुर
क्या आपको मालूम है कि पंजाब के कंढी इलाके में भी कभी एक ऐसा रणक्षेत्र था, जिसे स्थानीय लोग आज भी ‘सीबे दा-युद्धक्षेत्र’ के नाम से जानते हैं? आम जनता युद्ध की विभीषिका से बची रहे, इसलिए इस स्थान को युद्ध के लिए चिन्हित किया गया था। यह वही स्थल है जहां सीबा रियासत के राजाओं ने अपने शौर्य, रणनीति और युद्धकौशल का प्रदर्शन किया।
यह युद्धभूमि उस स्थान पर सुनिश्चित की गई थी जहां सीबा, दत्तारपुर, होशियारपुर और नूरपुर की सीमाएं मिलती थीं। स्पष्ट था कि युद्ध सीमित क्षेत्र में हो, जनता सुरक्षित रहे, और राजधर्म निभाया जाए। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह मैदान कलैहद, कलैह, बड़ापिंड और चंद्रापिंड के आसपास फैला था। यह इलाका आज के तलवाड़ा कस्बे में समाहित हो चुका है।
बस जाता था पूरा युद्ध-नगर
जब-जब रणभेरी बजती, इस मैदान के इर्द-गिर्द हथियार तेज़ करने वाले शिल्पी, रथ, घोड़े, ऊँट और हाथियों की मरम्मत करने वाले कारीगर, घायल सैनिकों और पशुओं के वैद्य, वीरगति पाए योद्धाओं को सम्मानपूर्वक ले जाने वाले, भोजन-पानी की व्यवस्था करने वाले, वीरगाथाएं गाने वाले चारण तथा मनोरंजन करने वाले भाँड और कलाकार, एक पूरा युद्ध-नगर बस जाता था।
धीरे-धीरे इन अस्थायी डेरे स्थायी बसाहट में बदल गए। यही बस्तियां आगे चलकर कलैहद, कलैह, बड़ापिंड और चंद्रापिंड के रूप में जानी गईं। इस क्षेत्र के ऐतिहासिक उल्लेखों का संदर्भ 1904 में प्रकाशित गेजेटियर ऑफ पंजाब (होशियारपुर) में भी मिलता है, जो ब्रिटिश शासन के अधिकार में संकलित किया गया था।
तलवारों की टंकार और रणभेरी की गूंज
आज यह रणभूमि और बड़ापिंड–चंद्रापिंड क्षेत्र तलवाड़ा में समाहित है। समय ने बहुत कुछ बदल दिया, परंतु, मिट्टी अब भी तलवारों की टंकार और रणभेरी की गूँज को संजोए है। सीबा, डाडा-सीबा और टैटंपालां—ये तीनों स्थल मिलकर उस स्वाभिमानी इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ हैं, जो पंजाब–हिमाचल की साझा सांस्कृतिक धरोहर है।
सीबैईया राजा डॉ. अशोक कुमार ठाकुर बताते हैं कि सीबैईया राजाओं की यह नीति कि युद्ध को निश्चित मैदान तक सीमित रखा जाए, उनके राजधर्म और प्रजावत्सलता का परिचायक है। कहा जाता है कि दुश्मन को आमंत्रित कर, खुले रण में युद्ध कर, वे अपने शौर्य का परिचय देते थे। यह परंपरा उन्हें इतिहास में विशिष्ट स्थान देती है।
तलवारें टकराईं हैं और सभ्यता ने आकार लिया
सीबै-दा-युद्धक्षेत्र केवल एक मैदान नहीं, बल्कि रणनीति, राजधर्म और सांस्कृतिक जीवन का संगम है। इस युद्ध क्षेत्र में इतिहास के निशान अब भी सांस लेते हैं। यह इस बात की गवाही देता है कि उस दौर में युद्ध सिर्फ़ तलवारों से नहीं होता था, युद्ध के लिए एक पूरी व्यवस्था करनी पड़ती थी, जिसमें सैनिकों के अलावा भी कई तरह के लोगों की भूमिका होती थी।
पंजाब की कंढी में छुपा ‘कुरुक्षेत्र’ जैसा सीबै-दा-युद्धक्षेत्र बताता है कि इतिहास केवल महलों में नहीं, बल्कि उन मैदानों में भी लिखा जाता है। सीबै-दा-युद्धक्षेत्र जैसे लड़ाई के मैदान इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, जो उस दौर के युद्ध नियमों की गवाही देते हैं, जहां जनता की हिफ़ाजत सर्वोपरि होती थी। ‘सीबै-दा-युद्धक्षेत्र’ ऐसा स्थान है जहां तलवारें टकराईं हैं और सभ्यता ने आकार लिया।
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