शिमला ने लेडी कर्ज़न के ‘पीकॉक ड्रेस’ को दिया आकार, पेरिस के हाउस ऑफ वर्थ ने किया तैयार, दिल थामने को मजबूर हुआ ‘दिल्ली दरबार’

शिमला ने लेडी कर्ज़न के ‘पीकॉक ड्रेस’ को दिया आकार, पेरिस के हाउस ऑफ वर्थ ने किया तैयार, दिल थामने को मजबूर हुआ ‘दिल्ली दरबार’
शिमला ने लेडी कर्ज़न के ‘पीकॉक ड्रेस’ को दिया आकार, पेरिस के हाउस ऑफ वर्थ ने किया तैयार, दिल थामने को मजबूर हुआ ‘दिल्ली दरबार’
विनोद भावुक। शिमला
4 नवंबर 1902 को वायसराय लॉर्ड कर्ज़न की पत्नी लेडी कर्ज़न ने शिमला से लेडी रैंडॉल्फ चर्चिल को पत्र लिख कर प्रस्तावित दिल्ली दरबार में पहनावे और शिष्टाचार पर सलाह दी। दिल्ली में होने वाले इस शाही कार्यक्रम की हर बारीक योजना शिमला में बुनी गई। उस दौर में शाही दरबार में लेडी कर्जन के पहरावे ने ग्लोबल मीडिया में सुर्खियां बटोरीं।
सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के मौके पर लॉर्ड कर्ज़न ने दिल्ली दरबार का आयोजन किया। इस आयोजन को उस समय इतिहास का सबसे भव्य आयोजन कहा गया। इसी दरबार के स्टेट बॉल में लेडी कर्ज़न ने वह ऐतिहासिक पीकॉक ड्रेस पहनी, जिसका ख्वाब शिमला में बुना गया और जिसे पेरिस के हाउस ऑफ वर्थ ने तैयार किया था।
लंदन में मौजूद शिमला की सोच
पीकॉक ड्रेस को सोने के कपड़े पर मोर पंखों की कढ़ाई थी। मोर की हर आंख में नीले-हरे बीटल विंग्स को लोग पन्ना समझ बैठे। हीरों का विशाल हार, मोतियों-हीरों की ब्रॉच और ऊँचे डायमंड प्वाइंट्स वाली टियारा। उस दौर की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीकॉक ड्रेस जब लेडी कर्ज़न हॉल में चलीं, तो भीड़ सांस रोके रह गई। उनकी पौशाक ब्रिटिश सम्राज्य की एक झलक भर थी।
‘द शिकागो संडे ट्रिब्यून’ ने अपने 27 सितंबर 1903 के अंक में पीकॉक ड्रेस पहले लेडी कर्ज़न की हैडिंग के साथ फुल पेज फोटो प्रकाशित की। दिल्ली, शिमला, लंदन और पेरिस के अखबारों ने इस ड्रेस को लेकर कई आलेख छापे और इस ड्रेस के चर्चे सारी दुनिया में हो गए। दिल्ली दरबार में लेडी कर्ज़न ने जिस ड्रेस को पहना था, आज वह ड्रेस केडलस्टन हॉल, इंग्लैंड में सुरक्षित है।
क्वीन के राजतिलक की पोशाक का शिमला कनेक्शन
ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला से जुड़ा लेडी मैरी कर्ज़न का नाम भारतीय कला के पुनर्जीवन के लिए याद किया जाता है। लेडी कर्ज़न सिर्फ़ फैशन आइकन नहीं थीं, वे भारतीय शिल्प की वैश्विक प्रतिनिधि बन गईं। उन्होंने अपनी पोशाकों के लिए चांदनी चौक दिल्ली की फैक्ट्री से सामग्री शिमला मंगवाई। शिमला से इंग्लैंड की क्वीन एलेक्ज़ेंड्रा की राजतिलक पोशाक भी बनी।
लेडी कर्ज़न दुनिया की सबसे सुसज्जित महिला थीं। लेडी कर्ज़न ने भारत के रेशम बुनकरों, कढ़ाई कलाकारों और पारंपरिक डिज़ाइनरों को आधुनिक फैशन के अनुरूप काम सिखाया। शिमला, कोलकाता से लेकर लंदन और पेरिस तक उन्होंने भारतीय वस्त्रों को फैशन बना दिया। भारत की कई लुप्त होती कलाएं उनके प्रयासों से फिर जीवित हुईं।
लेडी कर्जन शिमला में बनी ‘भारतीय महारानी’
दीवान जरमनी दास अपनी किताब ‘महाराजा’ में लिखते हैं कि एक रात महाराजा पटियाला, महाराजा कपूरथला और महाराजा धौलपुर ने राजसी हीरे-जवाहरात और शाही पोशाकें दिखाने के लिए लेडी कर्ज़न को ओक ओवर में आमंत्रित किया। राजाओं ने उनसे भारतीय महारानी की शाही पोशाक पहनने का आग्रह किया, जिसे लेडी कर्ज़न ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।
लेडी कर्ज़न को शाही पोशाक, कीमती मोतियों की मालाएं और रत्नजड़ित मुकुट पहनाए गए। मशहूर फोटोग्राफर लाला दीनदयाल ने लेडी कर्ज़न को भारतीय महारानी के रूप में कैमरे में क़ैद कर लिया। बाद में यह तस्वीर इंग्लैंड के एक नामी अख़बार में छप गई। इस पर ब्रिटिश सत्ता तिलमिला उठी, जिसके फल्स्व्रूप तीनों महाराजाओं के शिमला प्रवेश पर प्रतिबंध लग गया।
नालदेहरा में सबसे छोटी बेटी का गर्भधारण
शिमला में रहते हुए लेडी कर्ज़न की प्रकृति में गहरी रुचि बनी। 1904 में वे एक सींग वाले गैंडे को देखने की चाह में काज़ीरंगा पहुंची। उन्हें गैंडा तो नहीं दिखा, लेकिन स्थानीय ट्रैकर बलाराम हज़ारिका ने उन्हें एक सींग वाले गैंडे के संरक्षण की ज़रूरत समझाई। लेडी कर्ज़न ने अपने पति से तत्काल कार्रवाई की मांग की और काज़ीरंगा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट की नींव पड़ी, जो आगे चलकर काज़ीरंगा नेशनल पार्क बना।
लेडी कर्ज़न का शिमला से गहरा नाता बना। कर्ज़न दंपती की सबसे छोटी बेटी एलेक्ज़ेंड्रा नाल्डेरा का गर्भधारण साल 1903 में शिमला से 25 किलोमीटर दूर नालदेहरा में हुआ। इस बच्ची का नाम ‘बाबा’ पड़ा, एक भारतीय संबोधन है। बेटी का यह भारतीय नाम लेडी कर्ज़न के भारत की संस्कृति के प्रति गहरे प्रेम को दर्शाता है।
ताजमहल देख मरने को तैयार हो गईं लेडी कर्जन
लगातार सामाजिक दायित्वों, भारतीय जलवायु और स्वास्थ्य समस्याओं ने लेडी कर्ज़न को तोड़ दिया।
18 जुलाई 1906, लंदन में मात्र 36 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। कहा जाता है कि ताजमहल को चांदनी रात में देखकर उन्होंने कहा था, ‘अगर कोई मेरी कब्र पर ऐसा स्मारक बना दे, तो मैं आज ही मरने को तैयार हूं।
उनकी स्मृति में लॉर्ड कर्ज़न ने केडलस्टन हॉल में एक भव्य स्मारक चैपल बनवाया। आज भी संगमरमर की वह मूर्ति उनके असमय निधन के दर्द को बयान करती है। लेडी कर्ज़न की यह कहानी बताती है कि अंग्रेजों के लिए शिमला केवल सत्ता का केंद्र भर नहीं था, वह जगह थी जहां फैशन, कला, संरक्षण और साम्राज्य की नीतियां एक साथ गढ़ी जाती थीं।
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Jyoti maurya

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