जाखू के ‘बॉनी मून’ बंगले में था शिमला का पहला म्यूजियम, डेढ़ सदी पहले ब्रिटिश कर्नल क्रिस्टोफर टाइटलर के जुनून की प्रेरककथा
जाखू के ‘बॉनी मून’ बंगले में था शिमला का पहला म्यूजियम, डेढ़ सदी पहले ब्रिटिश कर्नल क्रिस्टोफर टाइटलर के जुनून की प्रेरककथा
विनोद भावुक। शिमला
शिमला में ‘हेरिटेज टूरिज़्म’ की बात होती है, तो यह याद करना ज़रूरी है कि इसका बीज 150 साल पहले ही बो दिया गया था। पर यह भी सच है कि बहुत कम लोग ही जानते हैं कि शिमला की जाखू पहाड़ी पर कभी एक ऐसा बंगला था, जिसे लोग ‘बॉनी मून’ कहते थे। बॉनी मून’ इसलिए खास था क्योंकि इसमें शिमला का पहला म्यूजियम बनाया गया था।
यह बंगला किसी आम अंग्रेज अफ़सर का नहीं, कर्नल रॉबर्ट क्रिस्टोफर टाइटलर का था। सैनिक होने के साथ वे वैज्ञानिक, फ़ोटोग्राफ़र और शिमला के पहले म्यूज़ियम मैन थे। उन्नीसवीं सदी में, जब शिमला ब्रिटिश हुकूमत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बन रहा था, उसी दौर में टाइटलर ने जाखू हिल पर अपने घर बॉनी मून’ में एक अनोखा सार्वजनिक संग्रहालय बना दिया था।
शिमला ने दी टाइटलर को मजबूत पहचान
1904 में प्रकाशित एडवर्ड जे बक की पुस्तक, ‘शिमला फास्ट एंड प्रेजेंट’ में जिक्र है कि इस म्यूज़ियम में भारत भर से लाई गई हज़ारों पक्षियों की प्रजातियां, सीपियां, जीवाश्म, पांडुलिपियां और प्राकृतिक इतिहास से जुड़ी वस्तुएं प्रदर्शित कीं गई थीं। टाइटलर और उनकी पत्नी हैरियट टाइटलर भारत में फ़ोटोग्राफ़ी के शुरुआती नामों में शामिल थे।
1857 की क्रांति के बाद, दिल्ली और उत्तर भारत के ऐतिहासिक क्षणों को कैमरे में क़ैद करने वालों में टाइटलर दंपती भी थे। यही वह दौर था जब बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय की आख़िरी तस्वीर ली गई और फ़ोटोग्राफ़ी इतिहास और सत्ता की गवाही बनने लगी। शिमला में रहते हुए टाइटलर की यह पहचान और भी मज़बूत हुई।
पक्षियों और जन्तुओं के नामों में अमर
टाइटलर सिर्फ़ सैनिक नहीं थे, वे प्रकृतिवादी भी थे। उनके नाम पर एक पक्षी का नाम Tytler’s Leaf Warbler रखा गया है। कई मेंढक, छिपकलियां और अन्य जीवों की प्रजातियां उनके नाम से जानी जाती हैं। पक्षियों और जन्तुओं के इन नामों ने उन्हें अमर कर दिया। उनकी वैज्ञानिक टिप्पणियां मशहूर पक्षी विज्ञानी ए.ओ. ह्यूम तक भेजी जाती थीं।
1872 में टाइटलर की मौत के बाद उनका शिमला वाला संग्रहालय बंद हो गया। हैरियट टाइटलर ने यह संग्रह शिमला को देने की कोशिश की, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ी। वर्षों तक बक्सों में बंद रहने से कीड़े, फफूंद और नमी ने हज़ारों नमूनों को नष्ट कर दिया। आख़िरकार जो कुछ थोड़ा-बहुत बचा, वह 1917 में लाहौर सेंट्रल म्यूज़ियम पहुंचा।
जिद और जुनून की गुमनाम कहानी
रॉबर्ट क्रिस्टोफर टाइटलर शिमला के उन किरदारों में से हैं, जिनका नाम आज न तो सड़कों पर दिखता है, न पर्यटन पुस्तिकाओं में नजर आता है, लेकिन अगर शिमला की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत की बात हो, तो जाखू हिला बॉनी मून’ बंगले में स्थित म्यूजियम और टाइटलर का ज़िक्र किए बिना शिमला की कहानी अधूरी है।
इतिहास यह बताता है कि शिमला का पहला म्यूज़ियम सरकारी योजना से नहीं, एक व्यक्ति के जुनून से बना था। अफसोस की बात है कि जिद और जुनून की यह कहानी और उसके पात्र शिमला की धुंध में कहीं गुम है। अगली बार जाखू जाओ तो महसूस कीजिएगा, कभी इसी पहाड़ी पर शिमला का पहला म्यूजियम था।
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