शिमला की ‘शीशे वाली कोठी’ : नौकर ने रद्दी में बेच दीं थीं कई पांडुलिपियां, ए ओ हयूम ने रॉथनी कैसल से ब्रिटिश म्यूज़ियम को दान किए थे पक्षियों के 82,000 नमूने

शिमला की ‘शीशे वाली कोठी’ : नौकर ने रद्दी में बेच दीं थीं कई पांडुलिपियां, ए ओ हयूम ने रॉथनी कैसल से ब्रिटिश म्यूज़ियम को दान किए थे पक्षियों के 82,000 नमूने
शिमला की ‘शीशे वाली कोठी’ : नौकर ने रद्दी में बेच दीं थीं कई पांडुलिपियां, ए ओ हयूम ने रॉथनी कैसल से ब्रिटिश म्यूज़ियम को दान किए थे पक्षियों के 82,000 नमूने
विनोद भावुक। शिमला
तेजस्वी ब्रिटिश प्रशासक ए ओ हयूम पक्षी-विज्ञान के इतने दीवाने थे कि इसी जुनून के चलते उन्होंने शिमला के जाखू में स्थित अपने घर को जीवंत संग्रहालय बना दिया था। 1889 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द नेस्ट्स एंड एग्स ऑफ इंडियन बर्ड्स’ की भूमिका में उन्होंने लिखा कि अनुपस्थिति में नौकर ने पांडुलिपियां चुरा कर रद्दी में बेच दीं, लेकिन वे फिर भी नहीं रुके।
जाखू की ढलानों पर खड़ी रॉथनी कैसल नाम की उस इमारत को स्थानीय लोग प्यार से ‘शीशे वाली कोठी’ कहते हैं। ए ओ हयूम ने इस भवन को पक्षी-विज्ञान के बड़े केंद्र के तौर पर विकसित किया। देश-विदेश में उनके संग्राहक उनसे पक्षियों के नमूने जुटाते। 1874 में उन्होंने 82,000 नमूने ब्रिटिश म्यूज़ियम को दान किए और 1873–1888 के बीच ‘स्ट्रे फीदर्स’ के 12 खंड संपादित-प्रकाशित किए।
अफसर, जो लीक से हटकर चला
ह्यूम को उनके समकालीन कभी एसेंट्रिक तो कभी इम्पॉसिबल कहते थे। अक्सर ऐसे शब्द ईमानदार और निर्भीक अधिकारियों के लिए ही गढ़े जाते हैं। 1871 में वे भारत सरकार के राजस्व, कृषि और वाणिज्य विभाग के सचिव बने, लेकिन ब्रिटिश नीतियों से असहमति ने उन्हें ब्रिटिश सत्ता के गलियारों में असहज कर दिया। 1876 में वायसराय लॉर्ड लिटन के आने पर विभाग ही समाप्त कर दिया गया।
ह्यूम को पहाड़ों की ‘सरकारी जन्नत’ से इलाहाबाद भेजा गया, लेकिन 1881 में सरकारी सेवा त्यागकर वे फिर अपने सपनों के घर शिमला लौटे। ह्यूम को राजनीति का संस्कार उन्हें अपने दादा, सांसद जोसेफ ह्यूम से मिला था। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के सूत्र यहीं शिमला में पनपे। एक दौर में वे थिओसोफी से प्रभावित हुए, शाकाहारी बने और पक्षी-संग्रह में गोली चलाना बंद करवाया।
इतिहास के आईने में रॉथनी कैसल
1838 में कर्नल रॉथनी ने जाखू पर यह भवन बनवाया। 1843 में डॉ. कार्टे ने यहां शिमला बैंक कॉर्पोरेशन शुरू की, लेकिन खड़ी चढ़ाई के कारण असफल रही। 1854 में अर्नोल्ड मैथ्यूज़ और 1867 में पी. मिशेल ने इस भवन को खरीदा और इसका नाम पड़ा रॉथनी कैसल। ह्यूम ने इसे खरीदकर इसे संग्रहालयनुमा दीवारों से सजाया और इसे शिमला की सबसे भव्य इमारतों में बदल दिया।
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Jyoti maurya

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