भारत में चित्रकला की नई यात्रा का गवाह शिमला का गुरुकुल, जहां कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग पर एमएस रंधावा ने दिए थे विशेष लेक्चर
भारत में चित्रकला की नई यात्रा का गवाह शिमला का गुरुकुल, जहां कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग पर एमएस रंधावा ने दिए थे विशेष लेक्चर
विनोद भावुक। शिमला
जब भारत आज़ादी की नई सुबह देख रहा था, उसी वक्त गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट शिमला के जरिये शिमला में रंग, रेखा और रचना की एक नई क्रांति जन्म ले रही थी। नई पीढ़ी के कलाकारों को दिशा देने के लिए मेयो स्कूल ऑफ आर्ट के पूर्व वाइस-प्रिंसिपल एस. एल. पराशर ने शिमला में एक नया संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव भेजा।
मेयो स्कूल के कलाकारों और कारीगरों को आश्रय
1951 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के पास गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट, शिमला की नींव रखी गई। यह कला का आश्रम था, जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ‘कला’ को जीवन का रूप मानते थे। पराशर खुद इसके संस्थापक प्रिंसिपल बने। उन्होंने पुराने मेयो स्कूल के कलाकारों और कारीगरों को यहाँ जगह दी, जिन्होंने विभाजन के बाद भारत में नई शुरुआत की।
स्कूल का पाठ्यक्रम अपने समय से बहुत आगे था। यह केवल चित्रकारी या मूर्तिकला नहीं सिखाता था, बल्कि जीवन सिखाता था। कला भाग के अंतर्गत ड्रॉइंग, पेंटिंग, आर्ट हिस्ट्री, यंत्र भाग के अंतर्गत डिज़ाइन, मेटल-क्राफ्ट, वुडवर्क और वास्तु भाग के तहत आर्किटेक्चर और स्पेस डिज़ाइन पढ़ाया जाता था। स्टूडेंट्स को 5 साल का डिप्लोमा कोर्स करवाया जाता था।
श्रेष्ठ कलाकारों ने तराशे कला के हीरे
यहां पढ़ाने वाले अध्यापक पी.एन. मागो, एन.के. डे, बलदेव राज रत्तन, माघर सिंह, ए.सी. गौतम, आर.आर. त्रिवेदी, अमर सिंह, और सतीश गुजराल अपने समय के श्रेष्ठ कलाकार थे। स्टूडेंट्स में एस.एल. दिवान, सोहन क़ादरी, शिव सिंह, गुलज़ार सिंह गिल, और आर.एस. रानिया जैसे कलाकार निकले, जो आगे चलकर भारतीय कला के ‘नॉर्थ ज़ोन’ को आकार देने वाले स्तंभ बने।
संस्थापक प्रिंसिपल पराशर ने स्टूडेंट्स को कक्षा से बाहर निकलकर प्रकृति के बीच चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया। रिज, मॉल रोड, और घाटियों के दृश्य। शिमला की हर गली ब्रश और रंग से भर उठती थी। कला अब किताबों में नहीं, बल्कि शिमला की हवा में घुल चुकी थी। भारतीय कला यहां से ऊंची उड़ान भर रही थी।
कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग पर रंधावा के लेक्चर
1959 में पराशर के सेवानिवृत्त होने के बाद, सुशील सरकार, जो बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के स्नातक थे,
इस स्कूल के प्रिंसिपल बने। पैसे की कमी थी, पर विचारों की नहीं। उन्होंने हर शनिवार स्टूडेंट्स के लिए इंडियन आर्ट हिस्ट्री और वर्ल्ड आर्ट पर फिल्में और व्याख्यान आयोजित किए। एम.एस. रंधावा जैसे प्रसिद्ध कला इतिहासकारों को बुलाकर कांगड़ा और बसोहली चित्रकला पर विशेष लेक्चर करवाए।
इस तरह शिमला की यह कला नगरी कला-इतिहास और आधुनिकता के संगम का केंद्र बन गई। शिमला का यह स्कूल केवल एक संस्थान नहीं था, यह भारत के उत्तर भाग में कला की चेतना का पुनर्जन्म था। इस स्कूल ने दिखाया कि विभाजन भले देश को बाँट दे, पर कला सीमाओं से नहीं, संवेदना से जीती जाती है।
चंडीगढ़ से चलता अब शिमला का स्कूल
1962 में जब चंडीगढ़ पंजाब की नई राजधानी बनी तो यह स्कूल भी वहाँ स्थानांतरित कर दिया गया।
बाद में 1966 में राज्य पुनर्गठन के बाद इसका नाम बदलकर गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़ रखा गया, जो आज भी उत्तर भारत का प्रमुख कला संस्थान है।
यह संस्थान न केवल पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की कला संस्कृति को जोड़ता है, बल्कि मायो स्कूल और शिमला स्कूल दोनों की परंपरा को अपने में समेटे हुए है। शिमला से निकली कला की लौ आज भी जल रही है। इस कला की रोशनी ने कितने ही कलाकारों की कला को ऊंची उड़ान दी है।
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