स्पीति की पहली बार जियो-हिस्ट्री रिकॉर्ड करने वाले आयरलैंड के भूविज्ञानी सर हेनरी हेडन, सौ साल पहले की स्टडी बनी हिमालयी भूविज्ञान की आधारशिला
स्पीति की पहली बार जियो-हिस्ट्री रिकॉर्ड करने वाले आयरलैंड के भूविज्ञानी सर हेनरी हेडन, सौ साल पहले की स्टडी बनी हिमालयी भूविज्ञान की आधारशिला
विनोद भावुक। शिमला
1904 में प्रकाशित हुई सर हेनरी ह्यूबर्ट हेडन की पुस्तक ‘द जियोलोजी ऑफ स्पीति विद पार्ट्स ऑस बुशहर एंड रूपशु’ आज भी हिमालयी भूविज्ञान की आधारशिला मानी जाती है। आयरलैंड के हेडन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य स्पीति घाटी, बुशहर और रूपशु क्षेत्र से जुड़ा रहा।
प्रसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन (1924) के मुताबिक स्पीति की कठोर जलवायु, ऊँचाई और दुर्गमता के बावजूद हेडन ने वहाँ की स्तरक्रमिकी (Stratigraphy) को वैज्ञानिक रूप से दर्ज किया। उनके इस काम से हिमालय के भू-इतिहास को समझने में नई दिशा मिली।
स्पीति से हुई पहाड़ों को पढ़ने की पहल
25 जुलाई 1869 को आयरलैंड के डेरी में जन्मे हेडन ने दक्षिण अफ्रीका के हिल्टन कॉलेज और फिर ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन से भूविज्ञान की पढ़ाई की। 3 जनवरी 1895 को उन्होंने गियोग्राफ़िकल सर्वे ऑफ इंडिया जॉइन किया और यहीं से हिमालय के दिल तक पहुंचने की उनकी यात्रा शुरू हुई।
स्पीति घाटी, बुशहर और रूपशु क्षेत्र में भूवैज्ञानिक कार्य करने के बाद उन्होंने तिराह अभियान (1897–98), फ्रांसिस यंगहसबैंड के साथ तिब्बत फ्रंटियर कमीशन (1903) और अफगानिस्तान (1907–08) में भी उन्होंने भूवैज्ञानिक कार्य किया। ये सभी कार्य ब्रिटिश भारत के सबसे कठिन और खतरनाक क्षेत्रों में हुए।
जियोग्राफ़िकल सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक
हेडन 1910 से 1920 तक हेडन जियोग्राफ़िकल सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक रहे। उन्हें 1911 में सीआईए और 1920 में नाइटहुड की उपाधि मिली। ये सम्मान उनके वैज्ञानिक योगदान की आधिकारिक स्वीकृति थे। भू विज्ञान के क्षेत्र में उनके काम को ग्लोबल पहचान मिली।
1912 में वे इंडियन साइन्स सर्विस के संस्थापकों में शामिल हुए और आगे चलकर इसके अध्यक्ष भी बने।
वे एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल के फेलो और 1917–18 में अध्यक्ष भी रहे। भू विज्ञान के क्षेत्र में उनके अध्ययन हिमालय के भू इतिहास का समझने का मजबूत आधार बने।
हिमालय का मौन इतिहासकार
जिन पहाड़ों को हेडन ने जीवन भर समझा और नापा, उन्हीं पहाड़ों में उनका अंत हुआ। स्विट्ज़रलैंड के फिन्स्टेरारहॉर्न पर चढ़ाई के दौरान 12 अगस्त 1923 को हुये भूस्खलन में उनकी मृत्यु हो गई। उनका शव लॉटरब्रुनेन में दफनाया गया।
डेढ़ सदी पहले भारत में विज्ञान के संस्थागत विकास में उनकी बड़ी भूमिका थी। स्पीति, लद्दाख और हिमालय की चट्टानों में हेडन का नाम एक ऐसे वैज्ञानिक के रूप में दर्ज है, जिसने पहाड़ों को सिर्फ देखा नहीं, पढ़ा भी। हेडन का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/the-first-successful-ascent-of-mount-everest-has-a-special-connection-to-dharamshala-charles-wylie-who-was-born-in-bakloh-was-the-mastermind-behind-this-expedition/
