शिमला में गोर्टन कैसल सहित भारत के कई शाही भवनों के डिजायनर सर सैमुअल स्विंटन जैकब

शिमला में गोर्टन कैसल सहित भारत के कई शाही भवनों के डिजायनर सर सैमुअल स्विंटन जैकब
शिमला में गोर्टन कैसल सहित भारत के कई शाही भवनों के डिजायनर सर सैमुअल स्विंटन जैकब
विनोद भावुक। शिमला
ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर, इंजीनियर, वास्तुकार, लेखक सर सैमुअल स्विंटन जैकब का डिज़ाइन किया गया शिमला में गोर्टन कैसल इंडो-सारसेनिक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें भारतीय झरोखे, गुंबद और ब्रिटिश वास्तुकला के तत्व शामिल हैं। यह भवन शिमला के ब्रिटिश प्रशासन और निवासियों के लिए बनाया गया।
शिमला के प्रशासनिक और सामुदायिक भवनों में सर जैकब के डिजाइन ने पहाड़ियों की वास्तुकला और प्राकृतिक परिवेश का मेल प्रस्तुत किया। गोर्टन कैसल सहित उनके डिजायन किए गए कई भवन आज भी शिमला के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन का हिस्सा हैं। उनके डिजायन किए गए भवनों में भारतीय और मूरिश शैली का मिश्रण है।
देश में वास्तुकला के अनमोल तोहफे
14 जनवरी 1841 को इंग्लैंड में पैदा हुये जैकब ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर ऑफिसर होने के साथ इंजीनियर, वास्तुकार और लेखक थे। थॉमस आर. मेटकाफ की 1982 में प्रकाशित पुस्तक, ‘ए ट्रेडिशन क्रिएटेड: इंडो-सरसेनिक आर्किटेक्चर अंडर द राज, हिस्ट्री टुडे’ में उन्हें इंडो-सारसेनिक वास्तुकला को शिखर देने वाला वास्तुकार बताया गया है।
जैकब ने भारत में कई सार्वजनिक और शाही भवन डिजायन किए, जिनमें राजस्थान के जयपुर और बीकानेर के महल और शिमला में गोर्टन कैसल आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। 1887 में बना जयपुर का एल्बर्ट हाल म्यूजियम, लक्ष्मी निवास पैलेस बिकानेर, उम्मेद भवन पैलेस कोटा और जयपुर गेट उनकी वास्तुकला के अनमोल तोहफे हैं।
भारतीय और यूरोपियन शैली का मिश्रण
सर जैकब के डिजायनों की एक खास बात है, जो उन्हें दूसरे ब्रिटिश वास्तुकारों से अलग बनाती है। वे भारतीय वास्तुकला को नकारते नहीं हैं, बल्कि उसके साथ यूरोपियन तकनीक को जोड़ कर नया प्रयोग करते हैं। उन्होंने पुरातन भारतीय निर्माण परंपराओं का सम्मान किया, जिससे उनके भवनों में स्थानीय शिल्प कौशल और यूरोपीय तकनीक का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है।
ब्रिटिश राज के दौरान शिमला में बने कई भवनों में जो इंडो-सारसेनिक वास्तुकला का असर भी देखने को मिला, उस निर्माण शैली के पीछे सर जैकब एक प्रमुख नाम था। उनके स्टाइल की खासियत की उनके डिजायन किए भवनों और उन्हें दूसरे इंजीनियरों से अलग साबित करती है। 4 दिसंबर 1917 को इंग्लैंड के वेरब्रिज में उनका देहांत हो गया, लेकिन अपने बनाए डिजायनॉन में वे आज भी जिंदा हैं।
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Jyoti maurya

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