अजब–गजब! सतलुज घाटी में पूजी जाती है रावण की बहन सूर्पणखा, ऐधन गांव की रहस्यमयी कथा
अजब–गजब! सतलुज घाटी में पूजी जाती है रावण की बहन सूर्पणखा, ऐधन गांव की रहस्यमयी कथा
डॉ. हिमेन्द्र बाली ‘हिम’/ करसोग
हिमाचल प्रदेश की सतलुज घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य के साथ- साथ अपनी अद्भुत पौराणिक मान्यताओं और जीवित लोक-परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। करसोग उपमंडल की बंथल पंचायत का ऐधन गांव ऐसी ही एक रहस्यमयी आस्था का केंद्र है, जहां लंका नरेश रावण की बहन सूर्पणखा आज भी ‘सूपणी देवी’ के रूप में पूजी जाती हैं।
यह मान्यता हिमालयी लोकसंस्कृति की उस परंपरा को उजागर करती है, जहां रामायण, वेद, पुराण और स्थानीय लोकविश्वास एक-दूसरे में घुल-मिलकर जीवित इतिहास बन जाते हैं। समुद्रतल से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर विमल (बिमला) नदी के तट पर बसे ऐधन गांव में अर्द्धनारीश्वर को समर्पित ऐधनेश्वर महादेव मंदिर के प्रवेश द्वार पर सूपणी देवी (सूर्पणखा) का मंदिर स्थापित है।
लोकश्रुति : रावण का शाप, शिव का वरदान
लोकश्रुति के अनुसार, जब रावण कैलाश से भगवान शिव का आत्मलिंग लेकर लंका लौट रहा था, तब करसोग क्षेत्र में उसे विश्राम करना पड़ा। शिव की शर्त के अनुसार लिंग को भूमि पर नहीं रखा जा सकता था। रावण ने वह लिंग अपनी बहन सूर्पणखा को सौंप दिया, किंतु लिंग का भार इतना बढ़ गया कि असहाय सूर्पणखा ने उसे भूमि पर रख दिया और वहीं शिवलिंग अचल रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
कहा जाता है कि इस पर क्रोधित रावण ने अपनी बहन को शाप दे दिया, लेकिन आशुतोष शिव ने सूर्पणखा को वरदान दिया कि मेरे दर्शन से पहले तुम्हारे दर्शन अनिवार्य होंगे। आज भी श्रद्धालु पहले नाक-कटी सूपणी देवी के दर्शन करते हैं, फिर ऐधनेश्वर महादेव से आशीर्वाद लेते हैं। इस मंदिर की करसोग क्षेत्र में बहुत मान्यता है।
हिमालय में रामायण की जीवित परछाईं
संस्कृति मर्मज्ञों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश का यह क्षेत्र केवल कथा का स्थल नहीं, बल्कि ऋग्वैदिक और त्रेता–द्वापर युगीन परंपराओं का जीवंत संग्रहालय है। यहां वसिष्ठ ऋषि, भृगु ऋषि, परशुराम, पांडव, नाग देवता और राक्षस कुल, सभी देव रूप में पूजित हैं। ममलेश्वर महादेव, अलैडी देव (बकासुर), धुमरी देवी, मशाण देव और अखंड धूनी, ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि यहां मिथक नहीं, आस्था सांस लेती है।
ऐधनेश्वर महादेव मंदिर में सदियों से अखंड धूनी प्रज्वलित है। मान्यता है कि किसी भी मांगलिक कार्य से पहले यहां लकड़ी और देसी घी अर्पित करने से कार्य निर्विघ्न पूर्ण होता है। यदि कभी धूनी बुझ जाए, तो उसे ममेल के ममलेश्वर महादेव से विशेष विधि द्वारा पुनः प्रज्वलित किया जाता है। यह परंपरा आज भी अक्षुण्ण है।
देवोत्सव, देवयात्रा और सामाजिक एकता
हर वर्ष यहां: 26 वैशाख को देवोत्सव, 8 भादों को ऐधनेश्वर महादेव जन्मदिन, मार्गशीर्ष अमावस्या को बूढ़ी दीवाली और हर तीन वर्ष में भव्य देवयात्रा का आयोजन होता है। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर देव आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियों, रोग और क्लेश से मुक्ति मिलती है।
संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. जगदीश शर्मा के अनुसार, ऐधन गांव जैसे स्थल धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन और शोध पर्यटन, तीनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आज ऐधन का ऐधनेश्वर महादेव मंदिर और सूपणी देवी का यह दुर्लभ पूजन स्थल, सुकेत–करसोग क्षेत्र को हिमाचल की पौराणिक धरोहरों के मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिला रहा है।
आस्था, इतिहास और रहस्य का अनोखा संसार
सतलुज घाटी का ऐधन गांव इस बात का प्रमाण है कि हिमालय में कथाएं केवल किताबों में नहीं, देव परंपराओं में जीवित रहती हैं। यहां रावण की भक्ति, शिव का वरदान और सूर्पणखा की पीड़ा, तीनों मिलकर आस्था, इतिहास और रहस्य का अनोखा संसार रचते हैं।
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