टैटंपालां: प्रेम ने बस्ती रची, प्रतिरोध ने सीमा खींची, इश्क़, इबादत और इंक़लाब के बीच जन्मी एक आज़ाद धरती
टैटंपालां: प्रेम ने बस्ती रची, प्रतिरोध ने सीमा खींची, इश्क़, इबादत और इंक़लाब के बीच जन्मी एक आज़ाद धरती
विनोद भावुक। कांगड़ा
पंजाब के होशियारपुर ज़िले की भुंगा तहसील का टैटंपालां कोई साधारण गांव नहीं है। यह गांव प्रेम, प्रतिरोध और राजशाही स्वाभिमान से रचा-बसा एक ऐसा भू-भाग है, जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी थी। टैटंपालां में मौजूद लखदाता की मजार सीबा रियासत के राजा सुन्दर सिंह और चकलादिया गांव की एक मुस्लिम गुज्जर युवती के इश्क़ की कहानी की मूक साक्षी है।
सीबा रियासत और टैटंपालां पूर्णतः स्वतंत्र रहे स्थान हैं। यहां प्रेम ने बस्ती रची, प्रतिरोध ने सीमा खींची और राजशाही स्वाभिमान ने आज़ादी बचाई। टैटंपालां में परवान चढ़ा राजा और गुजरी का प्रेम ढाड़ी लोकगीतों में आज भी गूंजता है। टैटंपालां बताता है कि इतिहास सिर्फ़ युद्धों से नहीं, इश्क़, इबादत और इंक़लाब से भी बनता है।
जिंदा या मुर्दा चाहिए सुन्दर सिंह
अंग्रेज़ी राज के अधीन आते ही सूब्बा लाहौर की जागीरें हिलने लगीं। दत्तारपुर और जसवां के राजाओं ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध बिगुल फूंका, पर दमन हुआ। इसी दौर में सीबा रियासत की आज़ादी भी अंग्रेज़ वायसराय की आंखों में खटकने लगी। सीमाओं की टोह, स्थानीय जागीरदारों की मदद और भीतर से सेंध, ये सब प्रयास शुरू हो गए।
एक ओर अंग्रेज़ सीबा के राजपरिवार को समारोहों में बुलाते, दूसरी ओर सीबा की जड़ों में छेद करने की कोशिशें चलती रहीं। एक बार लाहौर से लौटते हुए राजा राम सिंह के भाई सुन्दर सिंह ने सीबा की सीमा पर संदिग्ध गतिविधि देखी। झड़प हुई और गोलीबारी में अंग्रेज़ अफ़सर तथा सुन्दर सिंह का ही एक चचेरा भाई मारा गया। खबर फैली, मुनादियां निकलीं कि सुन्दर सिंह जिंदा या मुर्दा चाहिए।
छिपना, निकलना और प्रेम
खतरे की भनक लगते ही सुन्दर सिंह कुछ दिन ‘कोई’ में ‘छी’ की कुदरती मांद में छिपे। फिर पत्नी-बच्चों संग जौह गांव के पास टीला भोई सिंह (टीला सीबैईया) स्थित अस्तबल पहुंचे और भेष बदलकर घोड़ों सहित चकलादिया में अपने मित्र पूर्णशाह सुथरा की सराय में रहने लगे। चकलादिया तब मुस्लिम गुज्जर समुदाय का बड़ा गांव था।
यहीं वह सब हुआ, जिसने इतिहास को नई राह दी। एक कमसिन गुज्जर युवती सुन्दर सिंह पर मोहित हो गई। मुलाक़ातें बढ़ीं, गांव में चर्चा फैली। यह मुसलमानों का गांव था और सुन्दर सिंह का विरोध तय था। मुखिया पूर्णशाह सुथरा ने स्थिति की नज़ाकत को समझते हुए सुन्दर सिंह को स्थायी तौर पर गांव में बसाने से इंकार कर दिया।
टेंटों से बसा दिया गांव
पर प्रेम का निर्णय अडिग था। सुन्दर सिंह ने पत्नी के जेवरों के बदले दत्तारपुर के फतेह सिंह ढढ़वाल से 576 घम्मां बंजर भूमि खरीदी। वहां कपड़े के टेंट लगाए गए और वहीं से जन्म हुआ टैटंपालां बस्ती का। उधर, उस गुज्जर युवती ने सहेलियों की मदद से लखदाता के नाम एक कच्ची मजार बनवाई। इबादत के बहाने मुलाक़ातें होती रहीं। यह प्रेम ढाड़ी लोकगीतों में आज भी गूंजता है—
‘ज्यूंदा आ गया सुन्दरा…
फिरंगी थरिया-थरिया सी कंम्बिया…
मजनू दा बछड़ा बन गया,
जद गुजरी देखी नार…’
छावनी, शिल्प और सुरक्षा
राजा राम सिंह को भाई के जीवित होने का समाचार मिला। वे मिलने आए। दोनों भाइयों ने अंग्रेज़ों और पड़ोसी रियासतों से बचाव के लिए टैटंपालां में छावनी बसाने का निर्णय लिया। राजतिलक के बाद राम सिंह सीबा लौटे। सुन्दर सिंह ने टैटंपालां में लोहार, तरखान, मोची बसाए; सुरक्षा के लिए ढढ़वाल जनौडच, वियाल आदि राजपूत बिरादरियां आईं। टेंट और कच्चे मकानों से नाम पड़ा टैटंपालां।
अंग्रेज़ों ने सीबा पर कब्जे के लिए एक बार फिर कोशिश की, पर रात में राजा राम सिंह और सुंदर सिंह के दोतरफा हमले से उनका मंसूबा नाकाम हुआ। इस बीच 1857 की क्रांति ने अंग्रेज़ी ध्यान अन्यत्र मोड़ दिया। उनकी प्राथमिकता विद्रोह को रोकने की थी। इसलिए छोटी और सीमित संपन्नता वाली रियासत होने के कारण सीबा और टैटंपालां स्वतंत्र रहे।
राजवंश की निरंतरता
राजा राम सिंह नि:संतान थे। दत्तक की कोशिशें विरोध में अटक गईं। कालांतर में सुन्दर सिंह के पुत्र बीरबल सिंह, फिर उनके पुत्र दूनीचन्द राजा बने। दूनीचन्द के बाद नामा सिंह (नामा राम) का काल आया। यहीं नए भारत का निर्माण हुआ। 1947 में सीबा रियासत और स्वतन्त्र भू-भाग टैटंपालां भारतीय मानचित्र में समाए। 1971 तक रियासतों का अंत हुआ; सरकारी काग़ज़ों में राजा नामा राम ठाकुर नामा राम कहलाए।
नामा राम के बाद ठाकुर अनूप सिंह नाममात्र के राजा हुए। उनके पश्चात डॉ. अशोक कुमार ठाकुर का पूर्ण राजतिलक हुआ। 1966 के पुनर्गठन में सीबा हिमाचल प्रदेश में और टैटंपालां पंजाब में आ गया। आज सीबा रियासत व टैटंपालां के राजा डॉ. अशोक कुमार ठाकुर विवाहित हैं; उनकी संतानें राजकुमारी डॉ. शिखा ठाकुर और टीका डॉ. दिग्विजय सिंह प्रख्यात दंत चिकित्सक हैं।
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