पहले विश्व युद्ध के बाद 74 दिन के लिए डगशाई में रही पहली केंट साइकलिस्ट बटालियन, फिर इंग्लैंड के लिए हुई रवाना
पहले विश्व युद्ध के बाद 74 दिन के लिए डगशाई में रही पहली केंट साइकलिस्ट बटालियन, फिर इंग्लैंड के लिए हुई रवाना
अजय शर्मा। सोलन
सेना और साइकिल, पहली ही नज़र में केंट साइकलिस्ट बटालियन का नाम अजीब लग सकता है, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौर में यह इकाई ब्रिटिश सैन्य प्रयोगों की सबसे दिलचस्प मिसाल थी। जब यह यह बटालियन डगशाई पहुंची, तो कहानी और भी रोचक हो गई। डगशाई वह सैन्य स्टेशन था, जहां ठंडी जलवायु, ऊंचाई और एकांत, तीनों मिलकर इसे प्रशिक्षण और तैनाती के लिए आदर्श बनाते थे।
1919 के अंत में, अफगान युद्ध और सीमांत अभियानों के बाद, पहली केंट साइकलिस्ट बटालियन को 21 अगस्त से 3 नवंबर 1919 तक डगशाई में तैनात किया गया। यह वह समय था जब युद्ध थमा था, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य की नसें अभी भी सतर्क थीं। डगशाई में यह तैनाती युद्ध के बाद री-ग्रुपिंग, हिमालयी सीमांत अनुभव और इंग्लैंड वापसी से पहले अंतिम पड़ाव, इन तीनों का संगम थी।
डगशाई से इंगलैंड का सफर
सिरिल ब्रिस्टो अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ केंट साइक्लिस्ट बटालियन 1908–1920’ में लिखते हैं कि डगशाई केवल एक सैन्य छावनी नहीं थी, यह ब्रिटिश भारत की रणनीतिक शांति का प्रतीक था। युद्ध से लौटे सैनिक यहां अनुशासन, ठंडे मौसम और औपनिवेशिक सैन्य दिनचर्या में ढलते थे। केंट साइकलिस्ट बटालियन के लिए डगशाई युद्ध की थकान से साम्राज्य की अंतिम सलामी जैसा था।
संदेशवाहक, टोही और सीमित संसाधनों में तेज़ आवाजाही के लिए केंट साइकलिस्ट बटालियन को मोबाइल इन्फैंट्री के रूप में तैयार किया गया था। 1917 में उत्तर-पश्चिम सीमांत, 1918 में बलूचिस्तान और 1919 में अफगानिस्तान अभियान के इसे बैटल ऑनर मिले। यह बटालियन 8 नवंबर 1919 को इंग्लैंड के लिए रवाना हुई और फरवरी 1920 में इसका अस्तित्व इतिहास हो गया।
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