भीम और हिडिम्बा के गंधर्व विवाह का गवाह पांगणा का अम्बरनाथ मंदिर, उत्खनन में झलक रहा है शिल्प और इतिहास का गौरवमयी संगम

भीम और हिडिम्बा के गंधर्व विवाह का गवाह पांगणा का अम्बरनाथ मंदिर, उत्खनन में झलक रहा है शिल्प और इतिहास का गौरवमयी संगम
भीम और हिडिम्बा के गंधर्व विवाह का गवाह पांगणा का अम्बरनाथ मंदिर, उत्खनन में झलक रहा है शिल्प और इतिहास का गौरवमयी संगम
सत्य प्रकाश। मंडी
मंडी जिले की ऐतिहासिक नगरी पांगणा-सुकेत इन दिनों चर्चा में है। वजह है यहां स्थित प्राचीन अम्बरनाथ मंदिर, जिसकी खुदाई में शिल्पकला और इतिहास के गौरवशाली अवशेष सामने आ रहे हैं। सुकेत संस्कृति, साहित्य और जन-कल्याण मंच पांगणा-सुकेत के अध्यक्ष डाक्टर हिमेंद्र बाली ‘हिम’ मानते हैं कि महाभारतकाल में यह क्षेत्र पांडवांगण नाम से विख्यात था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहीं अम्बरनाथ मंदिर में भीम और हिडिम्बा का गंधर्व विवाह हुआ था। यही कारण है कि यह स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मंदिर का पुरातत्व महत्व
खुदाई में मिले चार आमलक, दो त्रिमुखी भद्रमुख और विशाल प्रस्तर शिलाएं यह प्रमाणित करती हैं कि यहां छठी से आठवीं शताब्दी के बीच शिखर शैली के मंदिरों का समूह रहा होगा। यह मंदिर पश्चिमी हिमालय की अनूठी वास्तु परंपरा का साक्षी है।
मंदिर प्रांगण में स्थित पत्थर से बना नंदी स्थानक और बैठा हुआ नंदी विग्रह अपनी विशिष्टता के लिए पूरे पश्चिमी हिमालय में प्रसिद्ध है।
इतिहास में उठे उतार-चढ़ाव
रियासती काल के अंतिम दौर तक मंदिर अपनी विशेष शैली में मौजूद रहा, लेकिन 1975–76 में यह मंदिर आग की भेंट चढ़ गया। 1980 के दशक में स्थानीय समाजसेवियों और अधिकारियों के प्रयास से इसका आधुनिक शैली में पुनर्निर्माण हुआ। मगर, बारिश और बर्फबारी के चलते महज 44 वर्षों में यह फिर क्षतिग्रस्त हो गया।
पुरातत्वविद् डॉ. जगदीश शर्मा का कहना है कि अगर वैज्ञानिक उत्खनन और संरक्षण कार्य नहीं हुआ, तो यहां दफन प्राचीन अवशेष नष्ट हो सकते हैं और इतिहास का एक पूरा युग खो जाएगा।
पारंपरिक शिखर शैली में हो पुनर्निर्माण
पांगणा का अम्बरनाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक धरोहर नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और शिल्पकला की अमूल्य निधि है। स्थानीय निवासी भी चाहते हैं कि इस मंदिर का पुनर्निर्माण भाषा एवं संस्कृति निदेशालय की देखरेख में पारंपरिक शिखर शैली या पत्थर-लकड़ी के संयोजन से किया जाए, ताकि यह कम से कम एक सहस्राब्दी तक सुरक्षित रह सके।
इस मंदिर के संरक्षण से न केवल इतिहास जीवित रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध परंपरा पर गर्व करने का अवसर भी मिलेगा।
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Jyoti maurya

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