नूरपुर के ‘लखू मोची’ का चमड़ा रंगने का फार्मूला, अंग्रेज़ों ने चुराकर पहुंचा दिया लंदन

नूरपुर के ‘लखू मोची’ का चमड़ा रंगने का फार्मूला, अंग्रेज़ों ने चुराकर पहुंचा दिया लंदन
नूरपुर के ‘लखू मोची’ का चमड़ा रंगने का फार्मूला, अंग्रेज़ों ने चुराकर पहुंचा दिया लंदन
विनोद भावुक। धर्मशाला
175 साल पहले जब यातायात के साधन न के बराबर थे, पहाड़ों में सफर आसान नहीं था। ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां, बरसात की फिसलन और सर्दियों की बर्फ, इन सबके बीच सफर के लिए मजबूत जूता ही असली सहारा था। उस दौर में नूरपुर रियासत का ‘लखू मोची’ ऐसे मजबूत, टिकाऊ और आरामदायक जूते तैयार करता था, जो पहाड़ी रास्तों की कठिन परीक्षा में खरे उतरते थे।
यूं तो नूरपुर में झाकू सहित और भी कई मोची थे, लेकिन ‘लखू मोची’ चमड़े की कुदरती रंगाई का जो फार्मूला जानता था, उससे चमड़ा बेहद मजबूत और नरम हो जाता था। इसी कारण लखू के बनाए जूते खूब पसंद किए जाते थे। 1840 के आते- आते ‘लखू मोची’ के हुनर के चर्चे इतनी दूर तक पहुँच चुके थे कि अंग्रेज़ अफसर तक उस मोची से मिलने को बेताव थे।
अंग्रेजों तक पहुंचे हुनर के चर्चे
‘लखू मोची’ अपने हुनर से लोगों के दिलों में जगह बना चुका था। लखू का काम इतना सटीक और भरोसेमंद था कि दूर-दराज़ के गांवों से लोग उसके पास जूते बनवाने आते थे। वह हर जूते में ग्राहक के पांव की बनावट और जरूरत को ध्यान में रखता था। यही कारण था कि उसके बनाए जूते आरामदायक तो होते ही थे सालों चलते भी थे।
नूरपुर का यह मोची सिर्फ अपने परिवार का पेट नहीं पाल रहा था। वह स्थानीय युवाओं को भी कारीगरी सिखा रहा था। उसने कई लड़कों को जूते बनाने की कला सिखाई, ताकि वे भी आत्मनिर्भर बन सकें। यह किसी छोटे कारीगर के लिए बहुत बड़ी बात थी कि अंग्रेज अफसरों को उसके हुनर की चर्चा सुनाई दी, पर यह क्या, छोटे कलाकार का बड़ा यश ही उसका दुश्मन बन गया।
लंदन पहुंच गया नूरपुर का फार्मूला
‘लखू मोची’ के बनाए चमड़े के जूते जब उस दौर के ब्रिटिश चमड़ा उद्योग के धन्ना सेठों के पास पहुंचे तो, वे इतने मजबूत चमड़े को देख कर हैरान रह गए। ‘लखू मोची’ का हुनर ब्रिटिश चमड़ा उद्योग के लिए खतरे की घंटी था। फिर क्या था एक स्थानीय कारीगर के चमड़ा रंगने के नेचुरला फार्मूले को चुराने की साजिश बुनी गई। उद्योगपतियों ने अंग्रेज़ अफसरों को रिश्वत दी।
अंबाला से एक अंग्रेज़ अफसर ट्रालबट को विशेष तौर पर इसी काम के लिए तैनात किया गया। और कहते हैं कि साम- दाम, दंड- भेद से अंग्रेज चमड़ा रंगने का नूरपुर का फार्मूला चुरा कर लंदन ले उड़े। ‘बर्फ की कोख से’ पुस्तक में इस प्रसंग को हिमाचल प्रदेश भाषा, कला एवं संस्कृति अकादमी शिमला के पूर्व निदेशक एवं शिमला से संबंध रखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार तुलसी रमन ने लिखा है।
💬 बड़ा सवाल
अंग्रेजों ने तो भारत को जनकर लूटा, पर क्या आज के समय में हम अपने स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक हुनर को उतना सम्मान दे रहे हैं, जितना देना चाहिए?
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/inspirational-shimla-major-haripal-singh-ahluwalia-member-of-the-first-indian-team-to-conquer-mount-everest-suffered-a-spinal-cord-injury-in-the-indo-china-war-opened-a-medical-institute-in-delhi/

Jyoti maurya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *