यूरोप की शाही पोशाक ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ के साथ कुल्लू शाल का डेढ़ सदी पुराना कांबिनेशन, यूरोप की भव्यता और हिमालय की गरिमा
यूरोप की शाही पोशाक ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ के साथ कुल्लू शाल का डेढ़ सदी पुराना कांबिनेशन, यूरोप की भव्यता और हिमालय की गरिमा
विनोद भावुक। मनाली
शाही दरबारों की रोशनी, रेशम और मखमल की चमक के बीच यूरोपीय महिलाएं जब ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ पहनकर सत्ता और सौंदर्य का प्रदर्शन करती थीं, उसी दौर में हिमालय की ऊँचाइयों में बुनी जा रही कुल्लू शाल भी वैश्विक फैशन यात्रा पर निकल चुकी थी। नोरा वॉ, रूटलेज की पुस्तक ‘द कट ऑफ वोमेंस क्लोथ्स :1600–1930’ में कुल्लू शाल के वैश्विक सफर का इतिहास दर्ज है।
ग्लोबल फैशन की एक नई भाषा
18वीं सदी के यूरोप में जब शाही दरबारों की महिलाएँ ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ पहनकर शक्ति, वैभव और शालीनता का प्रदर्शन करती थीं, तब किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि बाद में हिमालय की ‘कुल्लू शाल’ उसी शाही फैशन का हिस्सा बन जाएगी। ब्रिटिश दौर में जब यूरोपीय महिलाएं भारत आईं, तो उन्होंने यहां के हैंडलूम टेक्सटाइल को अपनाया।
शाही और कुलीन वर्ग की महिलाओं के वार्डरोब में भारतीय शालें, खासकर कुल्लू व किन्नौरी शाल एक स्टेटस सिंबल बन गईं। इतिहास बताता है कि यूरोप में ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ के साथ कंधों पर ओढ़ी जाने वाली शालें भारत से आयातित ऊनी शॉल और हिमालय की बुनाई कला इन तीनों ने मिलकर ग्लोबल फैशन की एक नई भाषा गढ़ी।
‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ के साथ कुल्लू शाल
‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ जिसे स्टीफ बॉडी गाउन भी कहा जाता था, 1700 के बाद यूरोप की सबसे औपचारिक कोर्ट ड्रेस थी। कंधे दिखाती लो, ओवल नेकलाइन, पीछे से कसी हुई बॉडी, कोहनियों तक आस्तीन, जिन पर लेस की कई परतें, भारी कपड़े, रेशम, मखमल और कीमती सजावट इस पोशाक की खासियत थी। यह पोशाक सिर्फ कपड़ा नहीं थी। यह राजसत्ता और सामाजिक हैसियत का प्रतीक थी।
इसी शाही सोच का एक अलग लेकिन सशक्त रूप दिखता है कुल्लू शाल में। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में हाथकरघे पर बुनी जाने वाली यह शाल। ज्यामितीय बॉर्डर, प्राकृतिक ऊन और संतुलित रंग संयोजन के लिए जानी जाती है। ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ की भव्यता और कुल्लू शाल की गरिमा दोनों ने मिलकर शाही महिला की पहचान को पूरा किया।
यूरोप और हिमालय का संगम
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश दौर में कुल्लू और किन्नौरी शालें यूरोपीय कुलीन वर्ग के लिए स्टेटस सिंबल बन गईं और वैश्विक फैशन संवाद का हिस्सा बनीं। आज जब सस्टेनेबल फैशन, हैंडलूम रिवाइवल, ‘लोकल टू ग्लोबल’ जैसे ट्रेंड चर्चा में हैं, तब कुल्लू शाल सिर्फ पहाड़ी पहचान नहीं, बल्कि वैश्विक विरासत का प्रतीक बन चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे कभी ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ थी।
लोकल टू ग्लोबल की चर्चा के बीच इतिहास की ओर लौटना जरूरी हो जाता है। यूरोप की ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ और हिमालय की कुल्लू शाल दोनों अलग भूगोल की देन होते हुए भी, शान, परंपरा और शिल्प के एक ही सूत्र से जुड़ी हैं। यूरोप की शाही पोशाक ‘ग्रैंड हैबिट दे कूर’ और हिमालय की कुल्लू शाल दोनों शान, परंपरा और शिल्प की विरासत हैं।
