बाबा बालक का कल्ट: हिमालय की वह संस्कृति जहां साधना खेतों में होती है और देवता जनता के बीच रहते हैं

बाबा बालक का कल्ट: हिमालय की वह संस्कृति जहां साधना खेतों में होती है और देवता जनता के बीच रहते हैं
बाबा बालक का कल्ट: हिमालय की वह संस्कृति जहां साधना खेतों में होती है और देवता जनता के बीच रहते हैं
अजय शर्मा। हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश का धार्मिक संसार केवल शास्त्रीय ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकविश्वास, जनश्रुतियों और जीवंत परंपराओं से बुना हुआ है। पश्चिमी हिमालय, विशेषकर शिवालिक पहाड़ियां ऐसी ही अनेक सिद्ध, नाथ और लोकदेवताओं की परंपराओं का केंद्र रही हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत प्रभावशाली और लोकप्रिय परंपरा है पशुपालक बालक के रूप में पूजे जाने वाले बाबा बालक नाथ की।
हिमाचल प्रदेश की धार्मिक संरचना में दो धाराएं साथ-साथ चलती हैं। एक ओर संन्यासियों और तपस्वियों की रहस्यमय साधना परंपरा, तो दूसरी ओर आम जनमानस की आस्था से उपजे लोकदेवता और सिद्ध-पंथ। नाथ संप्रदाय इसी दूसरी धारा का सशक्त उदाहरण है। बाबा बालक नाथ, बालक रूपी सिद्ध, चरपट नाथ और गोरखनाथ सबकी कथाएं कांगड़ा, हमीरपुर, चंबा और कुल्लू तक फैली हुई हैं।
इतिहास की अलग धाराएं, अलग लोककथाएं
लोककथाओं के अनुसार, बाबा बालक नाथ अपने पूर्वजन्म में एक तोता थे। जब भगवान शिव माता पार्वती को अमरकथा सुना रहे थे, तब वही कथा तोते ने सुन ली। शिव के त्रिशूल से बचते हुए वह तोता महर्षि वेदव्यास की पत्नी के गर्भ में प्रवेश कर गया, और शिव से वरदान प्राप्त कर मानव रूप में जन्मा।
यही दिव्य बालक आगे चलकर नौ नाथों और चौरासी सिद्धों में गिने गए और बाबा बालक नाथ कहलाए, यानी सदा बालक रूप में रहने वाले सिद्ध। इतिहास की दूसरी धारा में बाबा बालक नाथ को काठियावाड़ में जन्मा एक अलौकिक बाल-संन्यासी माना गया है, जिसने काशी में अध्ययन के बाद विवाह से इंकार कर गृहत्याग किया और हमीरपुर के शाहतलाई में निवास किया।
गांव- गांव में बाबा के चमत्कार की कथाएँ
बाबा बालक यहां एक लोहार स्त्री रत्नो के यहां गाय-बकरियां चराने लगे, पर स्वयं भोजन नहीं करते थे। एक वर्ष बाद जो चाछ-रोटी उन्होंने छिपा रखी थी, वह ज्यों की त्यों ताज़ा मिली और यहीं से शुरू हुई उनकी चमत्कारी छवि। बंजर गायों से दूध निकलना, रौंदे गए खेतों का फिर लहलहा उठना, ये सब कथाएं आज भी गांव-गांव सुनाई देती हैं।
गोरखनाथ उन्हें अपने योगी समुदाय में शामिल करना चाहते थे, पर बाबा बालक नाथ ने एकांत साधना को चुना। कहा जाता है कि वे उड़ते हुए शाहतलाई की पहाड़ी गुफा में पहुँचे, जहां दीपक सदैव जलता रहता था। यहीं उन्होंने जीवित समाधि ली। आज भी श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा बालक नाथ उसी गुफा में आज भी निवास करते हैं।
बकरियों की भेंट और लोककथा
शाहतलाई धाम की एक अनोखी परंपरा है जीवित बकरे की भेंट। यहां बकरा चढ़ाया जाता है पर उसका वध नहीं होता, उसे छोड़ दिया जाता है। लोककथा कहती है कि पास के जंगल में रहने वाला बाघ
बाबा से संकोच करता था, तब बाबा ने कहा था कि भक्त बकरे लाएँगे, तुम खा लेना, मैं बाकी प्रसाद स्वीकार कर लूंगा।
आश्विन मास में पंजाब, कांगड़ा और शिवालिकक क्षेत्रों से श्रद्धालु झंडे, चित्र और भजन गाते हुये
पैदल यात्रा करते हैं। यह यात्रा केवल मन्नत नहीं, बल्कि सामूहिक आनंद, मेलजोल और आस्था का उत्सव भी है। हिंदू, सिख और कभी मुस्लिम श्रद्धालु भी इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं। आज भी यह आस्था बरकरार है।
पशुपालन, कृषि, लोकजीवन और सामूहिक स्मृति
बाबा का प्रसाद और विभूति केवल धार्मिक वस्तुएं नहीं, वे एक सांस्कृतिक संचार तंत्र हैं। शाहतलाई से निकला प्रसाद दूर-दूर के गाँवों में बाबा बालक नाथ की उपस्थिति को जीवित रखता है। आज यह धाम हिमाचल प्रदेश सरकार के अधीन है, जिसका प्रबंधन जिला उपायुक्त हमीरपुर की अध्यक्षता में होता है। सरल आरती और स्थानीय भाषा की प्रार्थनाएं यही इसकी पहचान है। बाबा बालक नाथ का पंथ धार्मिक विश्वास संग पशुपालन, कृषि, लोकजीवन और सामूहिक स्मृति से जुड़ी परंपरा है। नादौन कॉलेज के इतिहास के सहायक प्रोफेसर सन्नी कुमार 2010 में इंटरनेशनल मल्टीडिसिप्लिनरी ई-जर्नल ‘द एक्सप्रेशन’ में लिखते हैं कि यह कल्ट हिमालय की उस संस्कृति को दर्शाता है, जहां साधना खेतों में होती है और देवता जनता के बीच रहते हैं।
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Jyoti maurya

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