शिमला के रिज की शान क्राइस चर्च के डिजायनर ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर मेजर जनरल बोइल्यू, मुग़ल मकबिलों की मरम्मत से लेकर शिमला के प्रमुख स्थापत्य निर्माण के नायक

शिमला के रिज की शान क्राइस चर्च के डिजायनर ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर मेजर जनरल बोइल्यू, मुग़ल मकबिलों की मरम्मत से लेकर शिमला के प्रमुख स्थापत्य निर्माण के नायक
शिमला के रिज की शान क्राइस चर्च के डिजायनर ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर मेजर जनरल बोइल्यू, मुग़ल मकबिलों की मरम्मत से लेकर शिमला के प्रमुख स्थापत्य निर्माण के नायक
विनोद भावुक। शिमला
शिमला के रिज की शान क्राइस चर्च सिर्फ एक चर्च नहीं है। यह चर्च इतिहास, संस्कृति और वास्तुशास्त्र की जीवित मिसाल है। यह चर्च शिमला की पहचान की तरह खड़ा है। उसकी उंची घंटियां, विंटेज घड़ी और रंगीन कांच की खिड़कियां, यहां आने वाले हर विजिटर के दिल में इतिहास के पन्नों की गूंज छोड़ जाती हैं। क्राइस चर्च के सामने खड़े होकर फोटो लेना हर पर्यटक की चाहत होती है।
कम ही विजिटर्स इस बारे में जानते हैं कि क्राइस चर्च का डिजायन एक ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर मेजर जनरल जॉन थियोफिलस बोइल्यू ने तैयार किया था। मेजर बोइल्यू ने ब्रिटिश भारत में कई महत्वपूर्ण काम किये, जिसमें मुग़ल मकबिलों की मरम्मत से लेकर शिमला के प्रमुख स्थापत्य निर्माण शामिल हैं। अपनी विशेषताओं के चलते रिज का क्राइस चर्च उनका अद्भुत काम है।
उत्तर भारत का दूसरा सबसे पुराना चर्च
क्राइस चर्च को मेजर जनरल बोइल्यू ने 1844 में नेओ गेथिक शैली में डिज़ाइन किया था। यह एक शानदार यूरोपीय स्थापत्य शैली है, जो ऊंची खिड़कियों, नुकीले मेहराबों और भव्य टॉवरों से भरी हुई है। करीब 13 साल की मेहनत के बाद, यह चर्च 10 जनवरी 1857 को समर्पित हुआ। मेरठ के सेंट जॉन चर्च के बाद यह उत्तर भारत का दूसरा सबसे पुराना चर्च है।
क्राइस चर्च की घड़ी 1860 में डोनेट की गई थी और यह शिमला का समय बताने वाला प्रमुख चिन्ह हुआ करती थी। चर्च के अंदर 5 रंगीन ग्लास की खिड़कियां हैं, जो ‘विश्वास, आशा, परोपकार, धैर्य और नम्रता’ का प्रतीक हैं। यहां का पाइप ऑर्गन1899 में लगाया गया था, जो पूरे उपमहाद्वीप में सबसे बड़ा था। चर्च की घंटी लगभग 35 साल बाद फिर बजाई गई, जिससे लोगों में पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं।
इंजीनियर, वैज्ञानिक और स्थापत्यकार
19वीं सदी के मध्य में जब ब्रिटिश शासन ने शिमला को भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने पर काम शुरू किया तो इस पहाड़ी नगर की तस्वीर बदलने लगी थी। इस दौर में मेजर जनरल जॉन बोइल्यू के हुनर के चर्चे होने लगे थे। बोइल्यू सिर्फ एक इंजीनियर नहीं थे, वे रॉयल सोसायटी के फ़ैलो भी थे और शिमला में मैग्नेटिक ऑब्ज़र्वेटरी स्थापित करने का काम भी संभाला।
मेजर जनरल जॉन बोइल्यू का भारत में काम इतना महत्वपूर्ण था कि शिमला के क्राइस चर्च जैसे निर्माण उनकी याद दिलाते हैं। शिमला का यह चर्च सिर्फ धर्मिक स्थल नहीं हैं। क्राइस चर्च शिमला की पहचान भी हैं। यह शिमला की धरोहर है। ब्रिटिश शिमला की यह धरोहर इमारत मेजर जनरल जॉन बोइल्यू के हुनर की गवाह है।
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Jyoti maurya

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