कांगड़ा की पहाड़ियों में सुलगी थी आज़ादी की पहली चिंगारी, अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गया था भैया महाराज सिंह का अदृश्य मोर्चा
कांगड़ा की पहाड़ियों में सुलगी थी आज़ादी की पहली चिंगारी, अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन गया था भैया महाराज सिंह का अदृश्य मोर्चा
विनोद भावुक। कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश की शांत पहाड़ियां सिर्फ़ मंदिरों, चाय बागानों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए नहीं जानी जातीं, इन्हीं वादियों में कभी ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ आज़ादी की सबसे शुरुआती चिंगारी भी सुलगी थी। इस चिंगारी का नाम था संत, सिपाही और क्रांतिकारी भैया महाराज सिंह। यहीं से धन जुटाया गया, यहीं से संदेशवाहक चले और यहीं से अंग्रेज़ी सत्ता के ख़िलाफ़ योजनाएं बनीं।
1849 के बाद, जब पंजाब पर ब्रिटिश कब्ज़ा हो चुका था, भैया महाराज सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी लड़ाई को पहाड़ों की ओर मोड़ा और यहीं से कांगड़ा का ऐतिहासिक प्रवेश होता है। ब्रिटिश दस्तावेज़ों के अनुसार, कांगड़ा की पहाड़ियों के गोसाईं, साधु-संत और धार्मिक संपत्तियों के संरक्षक महाराज सिंह के गुप्त नेटवर्क का अहम हिस्सा थे।
संत-सिपाही की रणनीति
कांगड़ा अंग्रेज़ों की नज़र में शांत पहाड़ी इलाका था, पर असल में क्रांति की छुपी प्रयोगशाला बन चुका। सिख, हिंदू और मुसलमानों की साझा ताकत से लड़ाई, पहाड़ी राजपूत सरदारों और पूर्व खालसा सैनिकों का गठबंधन और ब्रिटिश ‘डिवाइड एंड रूल’ की नीति को कांगड़ा हज़ारा क्षेत्र से ही ध्वस्त करना उनका सपना था।
इतिहासकारों के अनुसार, कांगड़ा की धार्मिक संस्थाएं और साधु समुदाय इसलिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि उनके पास जन-विश्वास, संसाधन और गुप्त आवाजाही की क्षमता थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने साफ़ लिखा कि महाराज सिंह के धार्मिक संपर्क उनकी सबसे बड़ी ताक़त हैं। यही कारण था कि कांगड़ा, होशियारपुर और जालंधर के इलाकों पर अचानक कड़ी निगरानी बढ़ा दी गई।
गिरफ़्तारी, लेकिन विचार क़ैद नहीं
लेकिन पहाड़ों की तरह महाराज सिंह भी कभी जम्मू, कभी कांगड़ा की पहाड़ियों में फिसल जाते थे। आखिरकार 1849 में उनकी गिरफ़्तारी हुई और फिर सिंगापुर के लिए निर्वासन हुआ, लेकिन कांगड़ा की वादियों में जो चेतना जगी थी, वह खत्म नहीं हुई। लोकगीतों, साधुओं की कथाओं और जनस्मृति में महाराज सिंह आज भी जीवित हैं।
कांगड़ा का यह इतिहास याद दिलाता है कि साधना और संघर्ष साथ चल सकते हैं। पहाड़ सिर्फ़ ध्यान के नहीं, दृढ़ प्रतिरोध के भी प्रतीक हैं आज़ादी की कहानी 1857 से नहीं, उससे कहीं पहले कांगड़ा की पगडंडियों से शुरू हो चुकी थी। भैया महाराज सिंह की विरासत कांगड़ा को यह पहचान देती है कि यह भूमि सिर्फ़ देवभूमि नहीं, वीरभूमि भी है।
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