पहली बार एवरेस्ट फतह करने का धर्मशाला से खास कनेक्शन, बकलोह में पैदा हुए चार्ल्स वाइली थे इस अभियान के सूत्रधार
पहली बार एवरेस्ट फतह करने का धर्मशाला से खास कनेक्शन, बकलोह में पैदा हुए चार्ल्स वाइली थे इस अभियान के सूत्रधार
विनोद भावुक। धर्मशाला
चार्ल्स वाइली को दुनिया 1953 के ऐतिहासिक ब्रिटिश माउंट एवरेस्ट अभियान के ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी के रूप में जानती है। यह वह अभियान था, जिसमें एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने पहली बार एवरेस्ट फतह किया।वाइली स्वयं एवरेस्ट पर 23,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित कैंप चार तक पहुँचे थे और और शेरपाओं के साथ साउथ कोल तक कैंप स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी।
ब्रिटिश सैन्य अधिकारी, पर्वतारोही और एवरेस्ट अभियान के सूत्रधार चार्ल्स जिओफ्री वाइली की यह कहानी दलाईलामा और क्रिकेट स्टेडियम के लिए वैश्विक पहचान रखने वाले धर्मशाला हिल स्टेशन की एक कम-चर्चित, लेकिन बेहद दिलचस्प कहानी है। पर्वतारोहण में उनके योगदान के लिए उन्हें 1995 में ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पाइर से सम्मानित किया गया।
गोरखाली बोलने वाले अंगेज़
चार्ल्स वाइली का जन्म 24 दिसंबर 1919 को बकलोह में हुआ, जो उस समय गोरखा रेजिमेंट की अहम छावनी थी। बकलोह और धर्मशाला का इलाका ब्रिटिश गोरखा रेजिमेंट का प्रमुख केंद्र रहा है। उनके पिता स्वयं गोरखा सैनिकों की भर्ती से जुड़े थे। धर्मशाला की पहाड़ियों में, वाइली ने अपना बचपन बिताया। हैरानी की बात यह है कि छह साल की उम्र मेन वे गोरखा सैनिकों की भाषा गोरखाली में धाराप्रवाह बात करने लगे थे।
चार्ल्स वाइली ने रॉयल मिलिट्री अकादमी, सैंडहर्स्ट से प्रशिक्षण लिया और 1939 में ब्रिटिश आर्मी में कमीशन प्राप्त किया। फिर भारत लौटकर गोरखा राइफल्स के साथ तैनात हुए। उनकी पोस्टिंग दोबारा उसी क्षेत्र धर्मशाला में हुई, जहाँ उन्होंने बचपन बिताया था। यही वह समय था जब हिमालय उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन गया और पहली बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को जीतने की योजना पड़ी।
रिटायरमेंट के बाद भी गोरखाओं से रिश्ता
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वाइली 10वीं गोरखा राइफल्स के साथ लड़े और जापानी सेना द्वारा पकड़े गए। मलेशिया तथा बर्मा–थाईलैंड रेलवे के प्रिजनर ऑफ वार कैंपों में 1942 से 1945 तक कैद रहे। यह वही रेलवे है, जिसे इतिहास में ‘डेथ रेलवे’ कहा जाता है। युद्धबंदी बाद में रिहा हुये। कुछ सालों बाद भारत भी अंग्रेजों से आजाद हो गया गया, लेकिन वाइली की धड़कनों में धर्मशाला धड़कता रहा।
1953 के ऐतिहासिक ब्रिटिश माउंट एवरेस्ट अभियान ने उन्हें दुनिया भर में शोहरत दी, लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी उनका रिश्ता हिमालय से नहीं टूटा। वे ब्रिटेन–नेपाल सोसाइटी के चेयरमैन, गोरखा वेलफेयर ट्रस्ट के सचिव रहे। वे ब्रिटेन–नेपाल मेडिकल ट्रस्ट से भी जुड़े। आज भी दुनिया में कहीं भी माउंट एवरेस्ट पर्वतारोहण के लिए कोई भी तैयारी शुरू होती है, तो वाइली का जिक्र जरूर होता है।
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