कांगड़ा के लोककंठ का ‘बख़रा’ कमाल, शिक्षक कर रहा लोकगीतों की संभाल, शिक्षक वेद प्रकाश शर्मा की साधना बेमिसाल

कांगड़ा के लोककंठ का ‘बख़रा’ कमाल, शिक्षक कर रहा लोकगीतों की संभाल, शिक्षक वेद प्रकाश शर्मा की साधना बेमिसाल
कांगड़ा के लोककंठ का ‘बख़रा’ कमाल, शिक्षक कर रहा लोकगीतों की संभाल, शिक्षक वेद प्रकाश शर्मा की साधना बेमिसाल
विनोद भावुक। धर्मशाला
कांगड़ा जनपद की धीरा तहसील के छोटे से गांव मरहूं में रहने वाले एक शिक्षक बीते अढ़ाई दशकों से ऐसा काम कर रहे हैं, जो न तो किसी पाठ्यक्रम में है और न ही किसी सरकारी योजना में, लेकिन जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। नाम है वेद प्रकाश शर्मा, पेशा स्कूल कैडर में हिंदी के प्रवक्ता और मिशन है कांगड़ा के लोकगीतों को उनकी मूल आत्मा में सहेजना।
वेद प्रकाश शर्मा को खास तौर पर सुहाग गीत बेहद प्रिय हैं। ये वे लोकगीत हैं, जो विवाह के अवसर पर गाए जाते हैं। जहां एक ओर ढोलक की थाप और तर्ज़ की मिठास होती है, तो दूसरी ओर बेटी को विदा करते माता-पिता का करुण स्वर। इन गीतों में मायके की गलियां, मां की सीख, भाई का दुलार और विदाई की कसक, सब कुछ एक साथ बहता है।
बुजुर्ग कंठों से निकलती स्मृतियां
वेद प्रकाश शर्मा गांव-गांव जाकर बुजुर्ग महिलाओं से उनके बचपन और जवानी में गाए गए लोकगीत, तर्ज़ गीत, संस्कार गीत धैर्य से सुनते हैं। फिर उन्हें पारंपरिक अंदाज में ही संगीतबद्ध कर रिकॉर्ड करते हैं, ताकि लोकगीतों की मौलिकता, लय और भाव अक्षुण्ण रहे। उनके संग्रह में लंबी तर्ज़ वाले लोकगीत विशेष स्थान रखते हैं, क्योंकि ये गीत शब्दों से ज़्यादा स्मृति और अनुभूति में बसते हैं।
आज जब लोकसंस्कृति तेजी से मंचों से गायब हो रही है, वेद प्रकाश शर्मा ने सोशल मीडिया को लोकमंच बना दिया है। अब तक वे फेसबुक पर विवाह और जन्म संस्कार से जुड़े 199 लोकगीत अपलोड कर चुके हैं, जिन्हें हजारों लोग सुन चुके हैं और सराह चुके हैं।
शिक्षा से संस्कार तक की यात्रा
वेद प्रकाश शर्मा ने 1992 में डीएवी कॉलेज कांगड़ा से बीए, 1994 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, के क्षेत्रीय अध्ययन केंद्र धर्मशाला से एमए (हिंदी) और 1997 में यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू से बीएड किया। फरवरी 1999 में टीजीटी (आर्ट्स) शिक्षक के रूप में सेवा शुरू की और जून 2009 में पदोन्नति के बाद हिंदी के प्रवक्ता बने।
संगीत का शौक बचपन से था, लेकिन सितंबर 2001 में गुरु रमेश सोनी से भेंट ने उनके जीवन को दिशा और उद्देश्य दे दिया। गुरु के सान्निध्य में उन्हें शास्त्रीय गायन की बारीकियां, राग-रागिनी और कंठ साधना सीखी। साल 2009 में प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से कंठ गायन में संगीत प्रभाकर की पढ़ाई पूरी की। यहीं से लोक संगीत को सहेजने और नई पीढ़ी तक ले जाने का मिशन मिला और वे इस मिशन में जुट गए।
मज़ाक से मिशन बना लोकसाहित्य
एमए हिंदी के दौरान प्रोफेसर डॉ. गौतम ‘व्यथित’ से ‘लोकसाहित्य’ विषय पढ़ते हुए वेद प्रकाश शर्मा इतने प्रभावित हुए कि यही उनका जीवन विषय बन गया। बचपन में जिन लोकगीतों पर लोग हंसी उड़ाते थे और वे खुद भी जिनका मज़ाक उड़ाते थे, आज वेद प्रकाश शर्मा उन्हीं लोकगीतों के होकर रह गए हैं। आज उन गीतों को सहेजना उनका मिशन है।
वेद प्रकाश शर्मा सिर्फ़ गीत नहीं सहेज रहे, वे कांगड़ा की स्मृति, ग्रामीण स्त्री का स्वर, और संस्कारों की ध्वनि आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर रहे हैं। उनकी साधना बताती है कि लोकगीत सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, लोक का इतिहास होते हैं। ग्लोबल होती दुनिया के बीच लोक को सहेजने की शिक्षा दे रहे इस शिक्षक के जज्बे को जयहिन्द।
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Jyoti maurya

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