38 साल कसौली में रहीं ‘नेहरू परिवार की विदेशी बहू’, जिन्हें लोग कहते थे प्यार से ‘आंटी फोरी’

38 साल कसौली में रहीं ‘नेहरू परिवार की विदेशी बहू’, जिन्हें लोग कहते थे प्यार से ‘आंटी फोरी’
38 साल कसौली में रहीं ‘नेहरू परिवार की विदेशी बहू’, जिन्हें लोग कहते थे प्यार से ‘आंटी फोरी’
अजय शर्मा। कसौली
हिमाचल प्रदेश का कसौली शांत छावनी, औपनिवेशिक इमारतों और देवदार के जंगलों के लिए जाना जाता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि कसौली उस महिला का अंतिम ठिकाना बना, जिसने यूरोप के यहूदी संघर्ष, भारत के विभाजन, नेहरू–गांधी युग और भारतीय हस्तशिल्प आंदोलन को बेहद करीब से जिया। यह कहानी की नायिका हैं फोरी नेहरू, जिन्हें लोग प्यार से ‘आंटी फोरी’ कहते थे।
2002 में प्रकाशित मार्टिन गिल्बर्ट की पुस्तक ‘लेटर्स टू आंटी फोरी’ उनकी कसौली की जिंदगी की अनखुले संस्मरणों भी सामने लाती है। साल 1989 में इस नेहरू दंपति ने कसौली को अपना घर बनाया। यहीं 2002 में बीके नेहरू का निधन हुआ। 2017 में 108 वर्ष की उम्र में फोरी नेहरू ने भी कसौली में अंतिम सांस ली। कसौली उनके लिए सत्ता से दूर, स्मृतियों के करीब रहने की जगह थी।
लंदन में हुआ बुडापेस्ट और दिल्ली का मेल
फोरी नेहरू का जन्म 1908 में हंगरी के बुडापेस्ट में एक यहूदी परिवार में हुआ। यूरोप में यहूदियों पर बढ़ते अत्याचार, विश्वविद्यालयों में कोटा सिस्टम और फिर होलोकॉस्ट की त्रासदी, इन सबने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात ब्रज कुमार नेहरू (बीके नेहरू) से हुई, जो आगे चलकर भारत के बड़े राजनयिक और राज्यपाल बने।
1935 में विवाह के बाद वह भारत आईं और नाम पड़ा शोभा नेहरू, लेकिन पहचान बनी फोरी नेहरू। फोरी नेहरू केवल ‘नेहरू परिवार की विदेशी बहू’ भर नहीं थीं। उन्होंने धाराप्रवाह हिंदी सीखी, जीवन भर साड़ी पहनी और भारतीय समाज को भीतर से समझा। महात्मा गांधी के संपर्क में आकर उन्होंने महसूस किया कि आज़ादी सिर्फ राजनीति नहीं, आत्मनिर्भरता भी है।
मिशन के लिए समर्पित जीवन
भारत के विभाजन के समय फोरी नेहरू दिल्ली की इमरजेंसी कमेटी की एकमात्र महिला सदस्य थीं। उन्होंने पुराना किला और हुमायूं के मकबरे में शरण लिए हजारों मुसलमानों की सुरक्षा और स्थानांतरण में सक्रिय भूमिका निभाई। कई बार हिंसा और नरसंहार के समाचारों ने उन्हें अंदर तक हिला दिया, लेकिन वे रुकी नहीं और अपने मिशन में जुटी रहीं।
फोरी नेहरू ने महसूस किया कि रोटी से पहले, इंसान को सम्मान चाहिए। इसी सोच से उन्होंने रिफ़्यूजी हैंडिक्राफ्ट की शुरुआत की, जहाँ शरणार्थी महिलाएं कढ़ाई, सिलाई, बुनाई के ज़रिये आत्मनिर्भर बनीं।
यही पहल आगे चलकर सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज़ एम्पोरियम, ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट्स बोर्ड और भारत के हस्तशिल्प पुनर्जागरण की नींव बनी। फैब इंडिया की जड़ों में भी उसी सोच की छाया दिखती है।
अमेरिका-इंग्लैंड तक काम, कसौली में आराम
अपने पति के साथ फोरी नेहरू अमेरिका में राजदूत की पत्नी रहीं तो लंदन में हाई कमिश्नर हाउस की मेज़बान बनीं। उन्होंने असम, कश्मीर और गुजरात जैसे राज्यों में सामाजिक कार्य किया। इस बारे में कम ही लोगों को पता है कि 1976 के आपातकाल में वे उन गिनी-चुनी महिलाओं में थीं, जिन्होंने इंदिरा गांधी से जबरन नसबंदी जैसे मुद्दों पर सीधे सवाल किए थे।
जीवन की साँझ में वह कसौली में बसीं थी। 1989 में जब वे कसौली में बसीं तब उनकी उम्र 70 साल थीं और अगले 38 साल तक वे इसी हिल स्टेशन में रहीं। आज बेशक कसौली की पहाड़ियों में भले ही उनका नाम कहीं दर्ज न हो,लेकिन भारत की हस्तशिल्प परंपरा, विभाजन की मानवीय स्मृतियों और नेहरू–गांधी युग की अंतरात्मा में फोरी नेहरू की छाप गहराई से मौजूद है।
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Jyoti maurya

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