नादौन में दोस्ती में बदला कहलूर में गुरु गोविंद सिंह से हुआ टकराव,, राजा भीम चंद ने मुग़लों को रोका और इतिहास में अमिट छाप छोड़ी
नादौन में दोस्ती में बदला कहलूर में गुरु गोविंद सिंह से हुआ टकराव,, राजा भीम चंद ने मुग़लों को रोका और इतिहास में अमिट छाप छोड़ी
विनोद भावुक! बिलासपुर/नादौन
इतिहास में कहलूर के राजा भीम चंद का नाम एक शासक के साथ संघर्ष, स्वाभिमान और रणनीतिक संतुलन के प्रतीक के रूप में दर्ज है।
17वीं शताब्दी में राजा भीम चंद ने जहाँ एक ओर पहाड़ी राजनीति की जटिलताओं को साधा, वहीं दूसरी ओर मुग़ल साम्राज्य की कर वसूली नीति को खुली चुनौती दी।
कहलूर की गद्दी और राजवंशीय विरासत
लगभग 1651 में जन्मे भीम चंद, राजा दीप चंद और रानी जलाल देवी के पुत्र थे। वे चंदेल राजपूत थे और चंद्रवंशीय परंपरा से संबंध रखते थे।
27 अप्रैल 1665 को उन्होंने कहलूर राज्य की गद्दी संभाली। उनके शासनकाल (1665–1692) में कहलूर न केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय रहा, बल्कि आनंदपुर साहिब भी उनके क्षेत्राधिकार में आता था, जो आगे चलकर सिख इतिहास का केंद्रीय स्थल बना।
गुरु गोबिंद सिंह से टकराव: राजनीति बनाम प्रभाव
राजा भीम चंद और गुरु गोबिंद सिंह के संबंधों में आरंभिक वर्षों में तनाव आया। इतिहासकारों के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह के बढ़ते प्रभाव, उनके राजसी आचरण, और पांवटा साहिब से जुड़े एक विवाह जुलूस के मार्ग को लेकर मतभेद ने रिश्तों में कटुता पैदा की।
इसका परिणाम 1686 की भंगाणी की लड़ाई के रूप में सामने आया, जिसमें पहाड़ी राजाओं के गठबंधन को पराजय का सामना करना पड़ा। यह पराजय भीम चंद के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन अध्याय मानी जाती है।
नादौन: जहाँ दुश्मनी सहयोग में बदली
इतिहास की विडंबना देखिए कुछ ही वर्षों बाद वही राजा भीम चंद, 1691–92 के आसपास नादौन में लड़े गए हुसैनी युद्ध में मुग़ल फौज के विरुद्ध खड़े नज़र आते हैं और उनके साथ खड़े होते हैं गुरु गोबिंद सिंह।
मुग़ल सेनापति अलिफ़ ख़ान औरंगज़ेब के आदेश पर पहाड़ी रियासतों से कर वसूलने आया था. राजा भीम चंद ने कर देने से इनकार किया और गुरु गोबिंद सिंह से सहायता माँगी। परिणाम यह हुआ कि कहलूर–सिख गठबंधन की ऐतिहासिक विजय हुई और मुग़ल सेना को पीछे हटना पड़ा।
मुग़लों के विरुद्ध पहाड़ की आवाज़
नादौन की विजय ने यह स्पष्ट कर दिया कि पहाड़ी राज्य केवल मुग़लों के अधीनस्थ नहीं थे, वे संगठित होकर साम्राज्यवादी दबाव का सामना कर सकते थे. यह युद्ध आगे चलकर सिख–मुग़ल संघर्षों और खालसा पंथ के उदय की भूमिका भी बना।
मौत पर मतभेद, विरासत पर नहीं
राजा भीम चंद की मृत्यु को लेकर इतिहास में मतभेद है!
कुछ स्रोत 16 सितंबर 1692 बताते हैं, जबकि कुछ के अनुसार उन्होंने राजगद्दी छोड़कर संन्यास लिया था!
कुछ परंपराएँ उनकी मृत्यु को 1701 या उससे बाद की मानती हैं, लेकिन इस पर सभी सहमत हैं कि उनके बाद पुत्र अजीत/अजमेर चंद ने गद्दी संभाली और भीम चंद का नाम पहाड़ी रियातों के सबसे प्रभावशाली शासकों में शामिल हो गया।
इतिहास में स्थान: विरोधी नहीं, निर्णायक पात्र
1967 में करतार सिंह की लिखी पुस्तक “गुरु गोविंद सिंह एंड मुग़ल” और 2014 में प्रकाशित अमनदीप एस दहिया की पुस्तक ‘ फाउंडर ऑफ़ खालसा’ के मुताबिक ‘राजा भीम चंद को केवल गुरु गोबिंद सिंह का विरोधी कह देना इतिहास का सरलीकरण होगा।
वास्तव में वे उस दौर के शासक थे, जो परिस्थितियों के अनुसार टकराते भी थे और सहयोग भी करते थे! यही उन्हें एक जटिल लेकिन महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बनाता है।
