अंग्रेजों के भरोसेमंद साथी थे चंबा के शिकारी, कश्मीरी शिकारियों पर पड़ते थे भारी

अंग्रेजों के भरोसेमंद साथी थे चंबा के शिकारी, कश्मीरी शिकारियों पर पड़ते थे भारी
अंग्रेजों के भरोसेमंद साथी थे चंबा के शिकारी, कश्मीरी शिकारियों पर पड़ते थे भारी
विनोद भावुक। चंबा
क्या आप जानते हैं कि 100 साल पहले चंबा के शिकारियों की धाक पूरे भारत में थी? अंग्रेज शिकारी दूर-दूर से चंबा आते थे और यहां के शिकारियों को अपने साथ शिकार पर ले जाने के लिए होड़ लगाते थे। चंबा के शिकारियों के हुनर का जिक्र साल 1904 में लंदन से प्रकाशित एक किताब ‘द स्पोर्ट्समैन्स बुक फॉर इंडिया’ में मिलता है।
फ्रेडरिक जी. अफलालो द्वारा संपादित इस पुस्तक में कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों में शिकार के बारे में विस्तार से बताया गया है। पुस्तक के एक अंश में कश्मीरी शिकारियों और चंबा के शिकारियों की तुलना की गई है। इस पुस्तक में दर्ज है कि कश्मीरी शिकारी साहिब को पैसे कमाने का जरिया समझते हैं, लेकिन चंबा का शिकारी, आधी मजदूरी पर, उससे कहीं बेहतर है।
ईमानदारी, कौशल और वफादारी
यह पुस्तक ब्रिटिश चंबा के शिकारियों की ईमानदारी, कौशल और वफादारी की गवाही देती है। जहां कश्मीरी शिकारी अंग्रेजों को सिर्फ पैसे कमाने का साधन समझते थे, वहीं चंबा के शिकारी अपने काम के प्रति समर्पित थे और कम मजदूरी पर भी बेहतर सेवा देते थे। यही कारण था कि अंग्रेज़ शिकारी अपने साथ चंबा के स्थानीय शिकारी साथ रखते थे।
चंबा के शिकारी क्यों इतने प्रसिद्ध थे? इसके पीछे कई कारण थे। चंबा के शिकारी पहाड़ों की हर बारीकी को जानते थे। वे जानवरों की आदतों, उनके रहने के स्थानों और उनके आने-जाने के रास्तों से भली-भांति परिचित थे। वे अपने काम के प्रति ईमानदार थे। वे अपने साहिब को सही जगह ले जाते थे और सही समय पर शिकार करने का मौका देते थे।
अंग्रेजों के साथ घुलने- मिलने का हुनर
पुस्तक खुलासा करती है कि कश्मीरी शिकारी अधिक मजदूरी मांगते थे और अक्सर अपने स्वार्थ के लिए शिकार का फैसला करते थे, जबकि चंबा के शिकारी कम मजदूरी पर भी बेहतर काम करते थे। चंबा के शिकारी स्थानीय भाषा, रीति-रिवाजों और परंपराओं को अच्छी तरह जानते थे, जिससे अंग्रेज शिकारियों को उनके साथ घुलने-मिलने में आसानी होती थी।
‘द स्पोर्ट्समैन्स बुक फॉर इंडिया’ भारत में शिकार करने आने वाले अंग्रेजों के लिए एक गाइड की तरह थी। इसमें बताया गया था कि कहां शिकार करना है, कौन से जानवर कहां मिलते हैं, और किन स्थानीय लोगों को गाइड के रूप में रखना चाहिए। इसी किताब में चंबा के शिकारियों की तारीफ करते हुए लिखा गया कि वे कश्मीरी शिकारियों से कहीं बेहतर हैं।
जंगलों का पता, शिकार की समझ
चंबा जिला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा से जैव विविधता का केंद्र रहा है। यहां के घने जंगलों में हिम तेंदुआ, भूरा भालू, हिमालयी कस्तूरी मृग, नीली भेड़ और कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती थीं। यही वजह थी कि अंग्रेज शिकारी यहां आना पसंद करते थे। और इन जंगलों में उनका मार्गदर्शन करने के लिए चंबा के शिकारी सबसे भरोसेमंद साथी थे।
100 साल पहले जब संचार के साधन सीमित थे, तब भी चंबा के शिकारियों की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। अंग्रेज शिकारी उनकी तलाश में चंबा आते थे और उन्हें अपने साथ ले जाते थे। कालांतर में चंबा का शिकारी इतिहास के पन्नों में गुमनाम नायक बनकर रह गया। लंदन तक मशहूर चंबा के शिकारियों के बारे में इतिहास की किताबों में बहुत कुछ नहीं लिखा गया।
शिकारियों के मुक़ाबले मजदूर सुस्त
पुस्तक में चंबा के मजदूरों का भी जिक्र किया गया है। पुस्तक में दर्ज है कि चंबा के मजदूर मेहनती हैं, लेकिन बहुत आलसी हैं और उनकी तुलना चंबा के शिकारियों से नहीं की जा सकती। चंबा के शिकारी उस समय अपनी मेहनत और कौशल के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि उनकी तुलना में बाकी सब के सब फीके पड़ जाते थे।
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Jyoti maurya

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