सरहद से संसद तक का प्रेरक सफ़र, शिमला से जीत की हैट्रिक लगाने वाले सांसद प्रताप शिवराम सिंह की अनसुनी कहानी

सरहद से संसद तक का प्रेरक सफ़र, शिमला से जीत की हैट्रिक लगाने वाले सांसद प्रताप शिवराम सिंह की अनसुनी कहानी
सरहद से संसद तक का प्रेरक सफ़र, शिमला से जीत की हैट्रिक लगाने वाले सांसद प्रताप शिवराम सिंह की अनसुनी कहानी
विनोद भावुक। शिमला
पहाड़ियों से निकली कई कहानियां इतिहास में दर्ज हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी के नायक हैं सैनिक, किसान, समाजसेवी और सांसद रहे प्रताप शिवराम सिंह। कांग्रेस के टिकट पर शिमला संसदीय क्षेत्र से जीत की हैट्रिक लगाने वाले प्रताप शिवराम सिंह केवल सांसद नहीं थे। वे कई सामाजिक संगठनों के भी मजबूत स्तंभ थे।
प्रताप शिवराम सिंह अखिल भारतीय क्षत्रिय कोली महासभा के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। वे पूर्व सैनिक संघ, सिरमौर के सचिव, हिमाचल प्रदेश टेरिटोरियल काउंसिल के सदस्य और पांवटा लेबर यूनियन के अध्यक्ष रहे। उन्होंने सैनिकों, मज़दूरों और पिछड़े वर्गों की आवाज़ को मंच दिया और उनके हकों की आवाज मुखर की।
साधारण सैनिक से जूनियर कमीशंड ऑफिसर तक
27 दिसंबर 1912 को ब्रिटिश भारत के सिरमौर रियासत के नाहन में जन्मे प्रताप सिंह का जीवन खेतों और संघर्षों के बीच शुरू हुआ। पिता शिवराम सिंह एक साधारण कृषक थे, लेकिन बेटे के सपनों की उड़ान बड़ी थी। साल 1932 में उन्होंने ब्रिटिश इंडियन आर्मी जॉइन की। अनुशासन, साहस और नेतृत्व ने उन्हें जूनियर कमीशंड ऑफिसर तक पहुँचाया।
18 साल की सैन्य सेवा के दौरान प्रताप शिवराम सिंह को पांच आर्मी मेडल मिले, जो उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण थे। सेना से रिटायरमेंट के बाद प्रताप सिंह ने राजनीति और समाजसेवा को अपना लक्ष्य बनाया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर शिमला से लगातार तीसरी, चौथी, और पाँचवीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए।
पाकिस्तान और बर्मा की यात्राएं
प्रताप शिवराम सिंह के अनुभव सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने पाकिस्तान और बर्मा (म्यांमार) की यात्राएं कीं, जिससे उनका दृष्टिकोण और व्यापक हुआ। कोली समाज के उत्थान के लिए उनके प्रयासों और संघर्ष ने उन्हें इस कोली समाज के दिग्गज नेता के तौर पर स्थापित किया और उन्हें खुल कर जन समर्थन मिला।
24 जनवरी 1975 को पोर्ट ब्लेयर में उनका निधन हुआ। मात्र 62 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन हिमाचल प्रदेश की राजनीति और समाज में उनकी छाप आज भी जीवित है।
प्रताप शिवराम सिंह की कहानी हमें सिखाती है कि सैनिक की वर्दी उतारने के बाद भी देशसेवा कभी खत्म नहीं होती।
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Jyoti maurya

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