सुकेत के राजा का छोड़ दिया ताज, गुरु बन किया दिल्ली पर राज, सुंदरनगर के एमएलएसएम कॉलेज के अध्यक्ष रहे प्रो. हरि सेन की प्रेरककथा
सुकेत के राजा का छोड़ दिया ताज, गुरु बन किया दिल्ली पर राज, सुंदरनगर के एमएलएसएम कॉलेज के अध्यक्ष रहे प्रो. हरि सेन की प्रेरककथा
विनोद भावुक। हिमाचल बिजनेस
दिल्ली विश्वविद्यालय की भीड़ में, इतिहास पढ़ाते हुए एक शांत, सौम्य-स्वभाव के प्रोफेसर को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह व्यक्ति किसी जमाने में ‘राजा साहब’ कहलाता होगा।
लेकिन प्रो. हरि सेन ऐसे ही थे। राजसी वंश में जन्म, शाही खानदान का गौरव, लेकिन दिल बेहद नाजुक और बात बिल्कुल सरल।
15 अगस्त 1955 को सुकेत रियासत के शाही परिवार में सुंदरनगर में जन्मे हरि सेन, 1985 में अपने पिता ललित सेन के निधन के बाद सुकेत के 52वें राजा साहब बने, पर उन्होंने कभी अपने ऊपर ‘राजा’ होने का बोझ नहीं रखा। उनकी पहचान बनी “रामजस कॉलेज के प्रिय शिक्षक से। एक ऐसा शिक्षक, जिसकी क्लास में इतिहास सिर्फ पढ़ाया नहीं जाता था, जीया जाता था।
‘सर’ नहीं, ‘गाइड’
ब्रिटिश काल की साम्राज्यवादी नीतियां हों या राजस्थान के भील, हर विषय पर उनकी पकड़ आश्चर्यजनक थी। उपनिवेशकालीन राजस्थान, भील समुदाय, किसान विद्रोह और औपनिवेशिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक हलचल उनके शोध-क्षेत्र थे। इतिहासकार रामचंद्र गुहा से लेकर निखिल मेनन तक कई बड़े लेखकों ने अपनी किताबों में हरि सेन का नाम आदरपूर्वक लिखा है।
रामजस कॉलेज में 30 साल की सेवा के बाद भी छात्र उन्हें ‘सर’ नहीं, ‘गाइड’ कहते थे। उनकी बातें, उनकी हंसी, उनकी विनम्रता सब कुछ उन्हें शिक्षक से ज़्यादा एक इंसान बनाते थे। 1984 के दंगों पर अमिताव घोष के मशहूर निबंध में हरि सेन एक महत्वपूर्ण पात्र हैं। घोष ने उन्हें संवेदनशील, विवेकशील और साहसी व्यक्ति बताया है।एक ऐसा शख्स, जो दंगों के बीच भी मानवता का रास्ता खोज रहा था।
सादगी, सेवा और समर्पण
सुकेत रियासत के ‘राजा साहब’ होने के बावजूद न कोई राजसी ठाठ, न कोई दंभ और न ही कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा। बस अपने दादा राजा लक्ष्मण सेन बहादुर और अपने पिता ललित सेन
की विरासत को वह सादगी और सेवा से आगे बढ़ाते रहे। वे सुंदरनगर के महाराजा लक्ष्मण सेन मेमोरियल कॉलेज के अध्यक्ष और ट्रस्टी भी थे।
एक राजा भी ‘गुरु’ बन सकता है। महानता शाही पदवी से नहीं, कार्य और चरित्र से मिलती है। जीवन में विनम्रता, ज्ञान और संवेदनशीलता किसी भी वंश से बड़ी होती है। इसी विचार के साथ हरि सेन ने राजा की कुर्सी नहीं चाही, पर शिक्षक की कुर्सी पर आजीवन बैठे रहे। 30 मार्च 2024 को दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद 68 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। इसी के साथ एक युग का अंत हो गया।
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