दिल्ली की सत्ता के सबसे बड़े संघर्ष का गवाह बनी थी नूरपुर की जमीन, यहीं लिखा गया था मुगल–सूर संघर्ष का सबसे निर्णायक अध्याय

दिल्ली की सत्ता के सबसे बड़े संघर्ष का गवाह बनी थी नूरपुर की जमीन, यहीं लिखा गया था मुगल–सूर संघर्ष का सबसे निर्णायक अध्याय
दिल्ली की सत्ता के सबसे बड़े संघर्ष का गवाह बनी थी नूरपुर की जमीन, यहीं लिखा गया था मुगल–सूर संघर्ष का सबसे निर्णायक अध्याय
विनोद भावुक। धर्मशाला
कांगड़ा जिला का नूरपुर इलाका कभी मुगल–सूर संघर्ष के सबसे निर्णायक अध्याय का साक्षी बना था। आज जहां किले और लोककथाएँ हैं, वहीं 16वीं सदी में यही ज़मीन सिकंदर शाह सूरी के अंतिम राजनीतिक संघर्ष का मंच बनी थी। आर सी मजूमदार अपनी पुस्तक ‘द मुगल एम्पाइर’ में लिखते हैं कि नूरपुर रियासत में कभी दिल्ली की सत्ता के सबसे बड़े संघर्ष का गवाह बनी थी।
सूर वंश के अंतिम प्रभावशाली शासक सिकंदर शाह सूरी (असल नाम अहमद ख़ान सूरी) ने 1555 में कुछ महीनों के लिए दिल्ली–आगरा पर कब्ज़ा ज़रूर किया, लेकिन जल्द ही मुगल बादशाह हुमायूं ने सूर साम्राज्य की नींव हिला दी। 22 जून 1555 को सरहिंद की निर्णायक लड़ाई में हार के बाद सिकंदर शाह सूरी को पीछे हटना पड़ा और शिवालिक की पहाड़ियों में भाग कर नूरपुर रियासत तक गया।
नूरपुर का अध्याय, जिसने बदल दिया इतिहास
नूरपुर क्षेत्र में स्थित किला सिकंदर शाह सूरी का अंतिम शरणस्थल बना। यह किला तत्कालीन नूरपुर राज्य के राजा राजा बख़्त मल के संरक्षण में था। ‘अकबरनामा’ में दर्ज है कि 1557 में मुगल सम्राट अकबर और उनके संरक्षक बैरम ख़ान ने इस किले को घेर लिया। किले की यह घेराबंदी लगभग छह महीने चली।
25 जुलाई 1557 को सिकंदर शाह सूरी ने आत्मसमर्पण कर दिया। यहीं से सिर्फ़ सूर वंश की सत्ता समाप्त हुई और नूरपुर राष्ट्रीय इतिहास के केंद्र में आ गया। सिकंदर शाह सूरी का साथ देना राजा बख़्त मल को भारी पड़ा। उन्हें गिरफ़्तार कर लाहौर ले जाया गया बैरम ख़ान के आदेश पर बाद में उनका वध कर दिया गया। इस एक फैसले ने नूरपुर रियासत की दिशा और दशा बदल दी।
सूर अंश अस्त, मुगल वंश का सूरज उगा
नूरपुर के किले से समर्पण के बाद सिकंदर शाह सूरी को बिहार भेज दिया गया, जहां 1559 में उनका निधन हो गया। एक ऐसा शासक, जो कभी दिल्ली का ताज पहन चुका था, अंत में इतिहास के हाशिये पर चला गया। इसी के साथ सूरी वंश का अध्याय खत्म हो गया और हिंदोस्तान पर मुगल वंश का प्रभाव शुरू हो गया।
पंजाब के पठानकोट से सटा कांगड़ा जिला का नूरपुर उपमंडल अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है। नूरपुर सिर्फ़ कांगड़ा क्षेत्र की एक ऐतिहासिक रियासत नहीं, बल्कि यह रियासत मुगल–सूर संघर्ष की साक्षी
रही। यह रियासत अकबर के शुरुआती सैन्य अभियानों का गवाह बनी। नूरपुर हिमाचल प्रदेश के उस इतिहास का हिस्सा है, जो पाठ्यपुस्तकों से बाहर रह गया है।
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Jyoti maurya

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