‘देवी कोठी’ मंदिर की दीवारों पर तीन सदी बाद भी जीवंत चंबा के लहरू के रंगों का जादू

‘देवी कोठी’ मंदिर की दीवारों पर तीन सदी बाद भी जीवंत चंबा के लहरू के रंगों का जादू
‘देवी कोठी’ मंदिर की दीवारों पर तीन सदी बाद भी जीवंत चंबा के लहरू के रंगों का जादू
विनोद भावुक। चंबा
हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले की पहाड़ियों में बसा ‘देवी कोठी’ मंदिर आस्था का केंद्र और भारतीय कला इतिहास का एक जीवंत संग्रहालय है। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई पहाड़ी लघु चित्रकला की परंपरा को जिस कलाकार ने विशिष्ट पहचान दी, उनका नाम है लहरू।
18वीं सदी में राजा उमेद सिंह के 1748 से 1764 तक के शासनकाल के दौरान लहरू चंबा के प्रसिद्ध माणिकंठ चित्रकार परिवार से थे। चितरेरों का यह परिवार कभी मुग़ल दरबार लाहौर तक मशहूर था। लहरू की कृतियों में भी मुग़ल स्थापत्य की भव्यता और पहाड़ी संवेदना दिखाई देती है।
‘स्टेज सेट’ जैसा ‘बैकड्रॉप’
अन्य पहाड़ी चित्रकार गहराई और प्राकृतिक दृश्य रचते थे, वहीं लहरू ने एक अलग राह चुनी। उनकी पेंटिंग्स में पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि ‘स्टेज सेट’ जैसा बैकड्रॉप मिलता है। सपाट रंग, सीमित सजावट और सीधी रेखाओं के बीच किरदार पूरी तरह उभरकर सामने आते हैं।
1758 में चित्रित भागवत पुराण श्रृंखला, देवी कोठी मंदिर की भित्ति चित्रकला और कृष्ण लीला से जुड़े अनेक दृश्य उनकी चित्रकला के शिखर की गवाही देते हैं। एक ही चित्र में कई कथाएँ कहना लहरू की खासियत थी। रंगों और खंडों के ज़रिए वे दृश्य को बाँटते थे।
विकसित की अनूठी शैली
देवी कोठी की दीवारों पर बनी कथाओं में आप देखेंगे कि कहानी भीतर घट रही है, लेकिन ज़ोर बाहरी स्थापत्य पर है। ऊंचे मीनार, लाल ईंटों की ग्रिड, कोणीय स्तंभ और संगमरमर जैसी संरचनाएँ। ये इमारतें मानव आकृतियों से बड़ी और अधिक प्रभावशाली लगती हैं, जो लहरू की शैली की पहचान है।
लहरू के एक ही दृश्य में इमारत की तीन दीवारें एक साथ दिखाई देती हैं। यह तकनीक दर्शक को अधिक दृश्य जानकारी देती है। उनकी रचनाओं में अकबरकालीन अकबरनामा की झलक दिखाई देती है। छत्री, गुलदस्ता और फिनियल जैसे अलंकरण जहांगीर के काल के प्रभाव की ओर इशारा करते हैं।
जीवित है लहरू की विरासत
कला समीक्षक मानते हैं कि लहरू ने चंबा चित्रकला को अन्य पहाड़ी स्कूलों से अलग पहचान दी। उनकी शैली आज भी प्रेरक है। लहरू के वंशज आज भी चंबा में सक्रिय कलाकार हैं और उनकी कृतियों में वही पुरानी शैली, वही स्थापत्य प्रेम और वही सपाट लेकिन प्रभावशाली रंग दिखाई देते हैं।
देवी कोठी के भित्ति चित्र हों या भूरी सिंह संग्रहालय में सुरक्षित लघु चित्र, लहरू की कला आज भी दर्शकों को 18वीं सदी के चंबा में ले जाती है, जहां कथा, स्थापत्य और रंग एक साथ सांस लेते हैं। तीन सदी बाद भी उनके रंगों की दुनिया आबाद है।
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Jyoti maurya

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