लाहौल की हवा में सूखता मांस सिर्फ स्वाद नहीं, यह है सदियों पुरानी हिमालय की बुद्धिमत्ता जो आज भी है प्रासंगिक
लाहौल की हवा में सूखता मांस सिर्फ स्वाद नहीं, यह है सदियों पुरानी हिमालय की बुद्धिमत्ता जो आज भी है प्रासंगिक
विनोद भावुक । केलंग
हिमाचल प्रदेश के लाहौल जैसे दुर्गम क्षेत्रों में सदियों से मांस को सुखाकर संरक्षित करने की एक सरल वैज्ञानिक परंपरा जीवित है। वैश्विक शब्दावली में इसे जरकी कहा जाता है, जबकि स्थानीय रूप में इसे सुकुटी अथवा सुकुती के नाम से जाना जाता है। बिना फ्रिज और बिना केमिकल के लाहौल की ठंडी, शुष्क हवा और तेज़ धूप इस परंपरा को प्राकृतिक संरक्षण देती हैं।
लाहौल की ऊंचाई, कम नमी और ठंडी हवाएं मांस को धीरे-धीरे सुखाती हैं। नमक के साथ पतली कतरनों में काटा गया मांस धूप और हवा में टांगा जाता है। नमी कम और प्रोटीन सुरक्षित, जिस सिद्धांत पर आधुनिक जर्की उद्योग काम करता है, ठीक उसी सिद्धांत पर यह प्रक्रिया बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकती है और हिमालय की हवा में स्वाद सुरक्षित रहता है।
घरों से लेकर मठों तक सूखता मांस
गंधोला जैसे मठों के आसपास और लाहौल के कई गांवों में आज भी सर्दियों के लिए मांस सुखाते दृश्य आम हैं। यह सिर्फ भोजन नहीं है, क़बायली क्षेत्र का सदियों पुराना सर्वाइवल नॉलेज है। जब बर्फ़बारी में रास्ते बंद हों, तब यही ‘सुकुटी’ ऊर्जा और पोषण का भरोसा बनती है। कम नमी में प्रोटीन सघन हो जाता है और मांस महीनों तक बिना रेफ्रिजरेशन के रह सकता है।
लाहौल की हवा में सूखता मांस सिर्फ स्वाद भर नहीं, यह हिमालय की बुद्धिमत्ता है जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी। आज जब सेना के लिए हाई-प्रोटीन स्नैक्स की मांग बढ़ रही है, तब हिमालय की यह विरासत दुनिया को रास्ता दिखा सकती है। लोकज्ञान और आधुनिक फूड सेफ्टी मिलकर नई अर्थव्यवस्था का टिकाऊ भविष्य रच सकते हैं।
लाहौल से दिखा सकते हैं दुनिया को राह
दक्षिण अमेरिका की च’आर्की जिससे जर्की शब्द निकला है। अफ्रीका की बिल्टॉन्ग, तुर्की की पास्तिरमा, स्पेन की सेसिना, ये सब उसी मानव बुद्धि के उदाहरण हैं, जो लाहौल में भी दिखती है। फर्क बस इतना कि लाहौल में यह परंपरा अभी तक औद्योगिक नहीं बन पाई है। लाहौल की सुकुटी व्यवस्था सिर्फ स्थानीय समुदाय की आत्मनिर्भरता तक सीमित रहा है।
आज सूखे मांस का वैश्विक बाज़ार अरबों डॉलर का हो चुका है। यदि लाहौल की सुकुटी को जीआई टैग, हाइजीनिक पैकेजिंग और स्थानीय ब्रांडिंग मिले, तो बिना परंपरा तोड़े नई अर्थिकी और सतत आजीविका का आधार बन सकता है। सूखे मांस का यह कारोबार होम-स्टे, ट्रेकिंग रूट्स और ईको-टूरिज़्म के साथ मिल बर्फीला रेगिस्तान कहे जाने वाले लाहौल की ग्रामीण आय बढ़ा सकता है।
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