ज्वालामुखी की पंडा-बही: आस्था ऐसे लिखती है इतिहास और इतिहास पीढ़ियों तक ऐसे लेता है सांस

ज्वालामुखी की पंडा-बही: आस्था ऐसे लिखती है इतिहास और इतिहास पीढ़ियों तक ऐसे लेता है सांस
ज्वालामुखी की पंडा-बही: आस्था ऐसे लिखती है इतिहास और इतिहास पीढ़ियों तक ऐसे लेता है सांस
विनोद भावुक। कांगड़ा
ज्वालामुखी शक्तिपीठ उस अनोखी परंपरा का साक्षी है जहां परिवारों का इतिहास पंडा-बही रजिस्टर में सदियों से लिखा, सहेजा जाता रहा है। ज्वालामुखी में पुरोहित (पंडा) पीढ़ियों से यहां आने वाले यजमानों की वंशावली दर्ज करते आ रहे हैं। पंडा-बही में गाँव, जाति/जाती, गोत्र, विवाह, जन्म-मृत्यु, श्राद्ध, दान, यात्राओं की तिथियाँ, सब कुछ लिखा होता है। हर अगली पीढ़ी की यात्रा पर बही अपडेट होती जाती है।
कांगड़ा क्षेत्र में ज्वालामुखी उन चुनिंदा स्थानों में है, जहाँ हिंदू वंशावली अभिलेख लंबे समय से संजोए गए। हरिद्वार के बाद उत्तर भारत में जिन तीर्थों की बहियाँ शोधकर्ताओं के लिए अमूल्य मानी जाती हैं, उनमें ज्वालामुखी का नाम प्रमुख है। हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, यूपी से यहाँ आने वाले श्रद्धालु पूर्वजों के श्राद्ध, पिंडदान, मन्नत-पूजन के साथ-साथ वंश-स्मृति को दर्ज कराते रहे हैं।
बहियों की भाषा और संरचना
ज्वालामुखी की बहियों में देवनागरी, कहीं-कहीं लांडी-मुंडी/ स्थानीय लिपियाँ, और सांकेतिक लेखन भी मिलता है, ताकि बाहरी लोग आसानी से न पढ़ सकें। बहियां पहले गाँव, फिर जाति/जाती, और उसके बाद परिवार के अनुसार क्रमबद्ध होती हैं। यही कारण है कि पंडा केवल गाँव और जाति जानकर पीढ़ियों पीछे तक रिकॉर्ड निकाल लेते हैं।
इन बहियों को भारत में उत्तराधिकार और संपत्ति विवादों में प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है। इतिहासकारों और समाज-वैज्ञानिकों के लिए ये स्थानीय इतिहास, पलायन, विवाह-रुझान और सामाजिक संरचना का दुर्लभ स्रोत हैं। सिख इतिहास के अध्येताओं ने भी पंडा-बहियों और भट्ट-बहियों से गुरु परंपरा और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर महत्वपूर्ण सूचनाएँ जुटाई हैं।
संकट के बीच संरक्षण की पहल
आधुनिकता, शहरीकरण और पेशागत बदलावों के कारण यह परंपरा संकट में है। 2013 की आपदा जैसी घटनाओं ने कई स्थानों पर अभिलेख नष्ट किए। हालांकि 1980 के दशक से माइक्रोफिल्मिंग और हाल के वर्षों में डिजिटाइज़ेशन के प्रयास हुए हैं। 2025 में राष्ट्रीय अभिलेखागार ने घोषणा की कि ज्वालामुखी सहित कई तीर्थों की बहियों से सार्वजनिक डेटाबेस बनाने की दिशा में काम होगा।
ज्वालामुखी की बहियाँ केवल नामों की सूची भर नहीं हैं। ये परिवारों की स्मृति, कांगड़ा की सामाजिक गाथा, और भारत की जीवित इतिहास-धारा हैं। ज्वालामुखी के पंडा-बही रजिस्टर हमें बताते हैं कि आस्था कैसे इतिहास लिखती है और इतिहास कैसे पीढ़ियों तक सांस लेता है। अभिलेखों पर संकट के बीच संरक्षण की पहल सुखद है।
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Jyoti maurya

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