जिस चावल का रंग लाल, किसानों की कर रहा मालोमाल
जिस चावल का रंग लाल, किसानों की कर रहा मालोमाल
विनोद भावुक। कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश की मिट्टी और परंपराएं हमेशा से खास रही हैं। यही वजह है कि यहां की खेती सिर्फ अन्न पैदा करने तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन और सेहत से भी जुड़ी रही है। इसी परंपरा की सबसे अनमोल धरोहर है लाल चावल।
एक समय था जब मंडी, कुल्लू और कांगड़ा की घाटियों में लाल चावल की फसल लहराती थी, लेकिन समय के साथ आधुनिक किस्मों की ओर रुझान बढ़ा और यह परंपरा कम होती गई। अब फिर से किसानों ने इस प्राचीन धरोहर को जिंदा कर दिया है।
इसलिए खास है लाल चावल?
सामान्य चावलों के मुकाबले लाल चावल का रंग, स्वाद और पोषण तीनों अनोखे हैं।
इसमें आयरन, जिंक और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में होते हैं।
सबसे बड़ी बात – शुगर के मरीज भी इसे खा सकते हैं।
बाजार में इसकी कीमत 200 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है, जोकि बासमती से भी ज्यादा है।
किसानों को सफ़ेद चावल का दाम 30- 40 रुपये प्रति किलो तक ही मिल रहा है।
यहां- यहां होती है खेती
आज हिमाचल प्रदेश के करीब 1100 हेक्टेयर क्षेत्रफल में लाल चावल की खेती की जा रही है।
शिमला जिला – सुरु कूट, कुथरु, गानवी, नाडाला, कलोटी, देवीधार
चंबा जिला – मानी, पुखरी, साहो, सलूणी, तीसा
कांगड़ा जिला – बैजनाथ, धर्मशाला, बंदला
मंडी जिला – जंजैहली, चुराग, थुनाग
यह खेती जून–जुलाई में बोई जाती है और अक्तूबर–नवंबर तक फसल तैयार हो जाती है।
वैज्ञानिक रिसर्च कहती है
कृषि वैज्ञानिकों ने हिमाचल की लाल चावल की 16 किस्मों पर शोध किया है।
पता चला कि सामान्य चावलों में जिंक की मात्रा 12–15 पीपीएम होती है। लाल चावल में यह मात्रा लगभग 25.9 पीपीएम पाई गई। लाल चावल को पॉलिश नहीं किया जाता, इसलिए सारे पोषक तत्व बरकरार रहते हैं।
लाल चावल का उत्पादन सामान्य किस्मों से कम है। सामान्य धान की किस्में देती हैं 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, जबकि लाल चावल से केवल 20–22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। फिर भी किसान इसकी ओर लौट रहे हैं, क्योंकि इसकी बाजार में कीमत दोगुनी है और मांग लगातार बढ़ रही है।
पारंपरिक धरोहर और जैविक भविष्य
कृषि विश्वविद्यालयों ने भी दो उन्नत किस्में तैयार की हैं। एचपीआर 2720 और एचपीआर 2795, ताकि पैदावार भी बढ़े और परंपरा भी बनी रहे। लाल चावल की वापसी किसानों के लिए बेहतर आर्थिकी और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर सेहत का रास्ता खोल रही है। यह सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि हिमाचल की पारंपरिक धरोहर और जैविक भविष्य की पहचान है।
कृषि मंत्री चौधरी चंद्र कुमार कहते हैं कि लाल चावल की खेती हिमाचल के किसानों को नई दिशा दे रही है। यह परंपरा का पुनर्जीवन है और साथ ही यह संदेश भी कि प्राकृतिक और पारंपरिक खेती ही आने वाली पीढ़ियों की असली पूंजी है।
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