पंचरूखी के रिटायर्ड फौजी के हाथों के हुनर से बोलने लगती हैं बांस की कलाकृतियां और जीवित हो उठता है इतिहास, इंडिया बुक ऑफ रिकोर्डस में शामिल विनय अवस्थी
पंचरूखी के रिटायर्ड फौजी के हाथों के हुनर से बोलने लगती हैं बांस की कलाकृतियां और जीवित हो उठता है इतिहास, इंडिया बुक ऑफ रिकोर्डस में शामिल विनय अवस्थी
विनोद भावुक। पंचरूखी (कांगड़ा)
कांगड़ा जिले के पंचरूखी क्षेत्र से सटे लदोह गांव में रहने वाले विनय अवस्थी आज सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि हस्तकला, परंपरा और आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण हैं। सेना की एजुकेशन कोर में 17 वर्षों की सेवा और उसके बाद 19 वर्षों तक शिक्षक के रहे विनय अवस्थी सेवानिवृत्ति के बाद अपने हाथों के हुनर से बांस और लकड़ी से इतिहास, लोक-संस्कृति और आस्था को नई ज़िंदगी दे रहे हैं।
आज जब डिजिटल और मशीन-निर्भर युग में हाथों का काम हाशिये पर जाता दिख रहा है, ऐसे समय में बांस और लकड़ी से तराशी गई उनकी कलाकृतियां यह याद दिलाती हैं कि हुनर सिर्फ़ रोज़गार नहीं, संस्कृति की धड़कन होता है। अपने ही गाँव में उन्होंने एक म्यूजियम स्थापित किया है, जहां उनकी बनाई कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। उनका यही समर्पण उन्हें इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड तक ले गया।
वुड कार्विंग बनी इतिहास की भाषा
विनय अवस्थी की वुड कार्विंग सिर्फ़ सजावटी शिल्प नहीं है। उनकी हर कृति में देव संस्कृति, लोक मान्यताएं, धार्मिक प्रतीक, सामाजिक स्मृतियां और हिमालयी जीवन-दर्शन गहराई से उकेरे गए हैं। लोक देवताओं के प्रतीक, मंदिरों की स्थापत्य शैली, पारंपरिक दीपक, बर्तन और देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं—सब कुछ इतनी सहजता से आकार लेता है कि दर्शक कला नहीं, कहानी देखता है।
उनकी कलाकृतियां रेणुका देवी, ज्वालाजी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, काशी, अयोध्या, उज्जैन, हरिद्वार और नेपाल जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों तक पहुंच चुकी हैं। देश के कई स्थानों पर उन्हें अपने हुनर को प्रदर्शित करने का अवसर मिला है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब कला आत्मा से जुड़ी होती है, तो उसकी पहुंच सीमाओं से परे चली जाती है।
कारीगर नहीं, संस्कृति के संरक्षक
विनय अवस्थी खुद को सिर्फ़ कारीगर नहीं मानते। उनके लिए लकड़ी या बांस को नया रूप देना एक सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है। सैन्य प्रशासन की अनुशासनप्रियता और शिक्षक जीवन की संवेदनशीलता दोनों का संगम उनकी कला में दिखता है। यही वजह है कि उनकी रचनाएं न केवल सौंदर्य रचती हैं, बल्कि पीढ़ियों के लिए संदेश छोड़ती हैं।
वे कहते हैं कि हाथों से बनी चीज़ों में सिर्फ़ हुनर नहीं, इतिहास बोलता है। जब यह सोच ज़मीन पर उतरती है, तो वह आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती है कि परंपरा बोझ नहीं, पहचान होती है। विनय अवस्थी आज एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार और आंदोलन हैं, जो ग्रामीण आजीविका, सतत कला और सांस्कृतिक विरासत को नई दिशा दे रहा है।
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