मॉस्को, लंदन और अमेरिका के मंचों तक पहुंचा कांगड़ा की मिट्टी में पला रंगमंच
मॉस्को, लंदन और अमेरिका के मंचों तक पहुंचा कांगड़ा की मिट्टी में पला रंगमंच
विनोद भावुक। कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश की शांत घाटियां, देवदारों की सरसराहट और खुले आसमान के नीचे गूंजता संवाद। कांगड़ा सिर्फ़ प्राकृतिक सौंदर्य का नाम नहीं, बल्कि भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक निर्णायक अध्याय भी है। इसी कांगड़ा घाटी में बलवंत गर्गी ने सीखा रंगमंच का हुनर, जिसने आगे चलकर पंजाबी और भारतीय थिएटर की दिशा बदल दी।
1940–50 के दशक में, कांगड़ा वैली में नोरा रिचर्ड्स के थिएटर स्कूल में बलवंत गर्गी ने मंच की बारीकियां सीखीं। यह कोई साधारण प्रशिक्षण नहीं था, यहां अभिनय किताबों से नहीं, मिट्टी, लोककथा और देह भाषा से सिखाया जाता था। कांगड़ा की खुली हवा में रिहर्सल, पहाड़ों की खामोशी में संवाद की खोज, यहीं से गर्गी के भीतर का नाटककार आकार लेने लगा।
लोक से वैश्विक उड़ान
कांगड़ा में मिले लोक रंगों ने गर्गी की रचनाओं में स्थायी जगह बना ली। ‘लोहा कुट्ट’, ‘केसरो’, ‘कनक दी बल्ली’, ‘सुल्तान रज़िया’ जैसे नाटकों में ग्रामीण यथार्थ, मिथक और विद्रोह तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। कांगड़ा की मिट्टी में पला यह रंगबोध आगे चलकर मॉस्को, लंदन और अमेरिका के मंचों तक पहुंचा।
नोरा रिचर्ड्स के स्कूल में मिले प्रयोगधर्मी संस्कार ने गर्गी को पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ने का साहस दिया।
कभी ग्रामीण गरीबी और अंधविश्वास, कभी मिथक, कामना व मृत्यु और कभी आधुनिक हिंसा और बेचैनी। उनका रंगमंच यथार्थ से शुरू होकर मिथोपोइया तक पहुँचा और यह यात्रा कांगड़ा की घाटियों में ही आकार लेने लगी थी।
कांगड़ा का अदृश्य योगदान
रंगमंच का जिक्र आने पर अक्सर चंडीगढ़, दिल्ली या मुंबई की बात होती है, लेकिन कांगड़ा वह प्रयोगशाला थी जहां कलाकार खुले आसमान में निखरता, नाटक लोक से संवाद करता और निर्देशक डर से मुक्त होकर जोखिम लेता था। यही कारण है कि गर्गी सिर्फ़ नाटककार नहीं, संस्थान बने। पंजाब यूनिवर्सिटी के थिएटर विभाग से लेकर हार्वर्ड और येल तक उनकी गूंज सुनाई दी।
जब हिमाचल में सांस्कृतिक पर्यटन और थिएटर फेस्टिवल की बात होती है, कांगड़ा का यह अध्याय याद दिलाता है कि बड़े विचार शांत जगहों में जन्म लेते हैं। पहाड़ सिर्फ़ सुकून नहीं, सृजन भी देते हैं। कांगड़ा की घाटियों में सीखी गई वह रंग-भाषा आज भी कहती है कि थिएटर मंच से नहीं, मिट्टी से जन्म लेता है।
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