‘गेयटी के रंगचर’ : शिमला के रंगमंच का डेढ़ सदी का जीवित इतिहास और स्मृतियों का अमर दस्तावेज़
‘गेयटी के रंगचर’ : शिमला के रंगमंच का डेढ़ सदी का जीवित इतिहास और स्मृतियों का अमर दस्तावेज़
विनोद भावुक। शिमला
शहर सिर्फ इमारतों से नहीं बनते, उनकी आत्मा संस्कृति और रंगमंच से रची जाती है। शिमला जैसे ऐतिहासिक शहर के लिए यह बात और भी गहराई से सच है। शिमला के गेयटी थिएटर ने डेढ़ सदी से अधिक समय से रंगमंच की लौ को जलाए रखा है। इसी गौरवशाली परंपरा को शिमला की वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखिका और शोधकर्ता भारती कुठियाला ने अपनी पुस्तक ‘गेयटी के रंगचर’ के माध्यम से दस्तावेज़ी रूप देने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है
प्रख्यात रंगमंच विचारक नेमिचन्द्र जैन कहते हैं कि रंगमंच वह अदृश्य शक्ति है जो भिन्न-भिन्न वर्गों के दर्शकों को एक भावात्मक समुदाय में बदल देता है। ‘गेयटी के रंगचर’ रंगमंच को मनोरंजन से आगे सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक स्मृति के रूप में प्रस्तुत करती है। भाग एक में 22 महत्वपूर्ण रंगकर्मियों की रंगयात्रा शामिल है और भाग दो में इसमें रंगमंच से जुड़े 11 विचारोत्तेजक आलेख हैं।
अंग्रेज़ी दौर से वर्तमान तक गेयटी थिएटर
पुस्तक यह भी बताती है कि कैसे ब्रिटिश शासन के समय शिमला में रंगमंच की शुरुआत रॉयल होटल, रानी झांसी पार्क और सब्ज़ी मंडी जैसे स्थानों से हुई। अंग्रेज़ों के मनोरंजन के लिए बने नाट्य मंचों से
लेकर हिंदी और पहाड़ी रंगमंच के आधुनिक प्रयोगों तक, शिमला का गेयटी थिएटर शिमला की सांस्कृतिक रीढ़ रहा है।
पद्मश्री बलवंत ठाकुर ‘गेयटी के रंगचर’ को हिमाचल के रंगमंचीय इतिहास का अमूल्य अभिलेख मानते हैं।
रवीन्द्र त्रिपाठी के अनुसार यह पुस्तक उस खालीपन को भरती है, जो हिंदी रंगमंच के इतिहास लेखन में लंबे समय से मौजूद था। असीमा भट्ट इसे एक कठिन साधना और आने वाली पीढ़ियों के लिए
संस्कृतिक धरोहर बताती हैं।
रंगमंच का धड़कता हुआ इतिहास
क्योंकि रंगमंच क्षणिक होते हुए भी अगर दर्ज न किया जाए तो इतिहास से लुप्त हो जाता है। ‘गेयटी के रंगचर’ रंगमंच को मरणशील कला से निकालकर स्मृतियों का अमर दस्तावेज़ बना देती है। ‘गेयटी के रंगचर’ सिर्फ एक पुस्तक नहीं है, यह शिमला के रंगमंच का धड़कता हुआ इतिहास है। यह पुस्तक संगीत नाटक अकादमी के आर्थिक अनुदान से प्रकाशित की गई है।
यह किताब रंगकर्मियों, शोधार्थियों, छात्रों और संस्कृति प्रेमियों के लिए एक अनमोल संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी। जो रंगकर्म के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पक्षों को खोलते हैं। सौरभ प्रिंटर्स गेटर नोयडा से मुद्रित और ऑथर्स अपफ्रंट पब्लिकेशन से प्रकाशित 288 पेज वाली इस पुस्तक का मूल्य 945 रूपये है। पुस्तक थियेटर से जुड़ी भूख शांत करती है।
साधना से सृजन तक भारती कुठियाला
31 अगस्त 1963 को शिमला में जन्मीं भारती कुठियाला सिर्फ लेखिका नहीं, बल्कि रंगमंच की जीवंत साक्षी हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन की वरिष्ठ कलाकार, तीन दशकों का प्रशासनिक अनुभव, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सदस्य और कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत भारती कुठियाला
की ‘गेयटी के रंगचर’ पुस्तक उनकी शोध, संवेदना और प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
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