चंडीगढ़ और दिल्ली तक पहाड़ी लोकसंगीत से धूम मचा रही कश्मीरी लाल, पवन और संजीव की तिकड़ी
चंडीगढ़ और दिल्ली तक पहाड़ी लोकसंगीत से धूम मचा रही कश्मीरी लाल, पवन और संजीव की तिकड़ी
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जब धौलाधार में ढलती शाम के साथ खंजरी की मधुर थाप और ढोलक की गूंज सुनाई देती है, तो लगता है जैसे सदियों पुरानी परंपरा फिर से जीवित हो उठी हो। लोकगायक कश्मीरी लाल और उनके भांजों पवन व संजीव की लोकगीत गा नहीं रहे हैं, बल्कि लोकसंगीत को बचाने की मुहिम में जुटे हैं। इस तिकड़ी के लिए संगीत कमाई का जरिया नहीं, आत्मा की आवाज़ है।
करीब ढाई साल पहले बनी कश्मीरी लाल, पवन और संजीव की तिकड़ी हिमाचल प्रदेश के कई जिलों के साथ दिल्ली और चंडीगढ़ तक अपनी प्रस्तुति दे चुकी है। कश्मीरी लाल अपने भांजों के गुरु हैं। उन्होंने उन्हें केवल गाना ही नहीं सिखाया, बल्कि पारंपरिक वाद्य जैसे रुवाणा और खंजरी बजाना भी सिखाया। साथ ही यह भी समझाया कि लोकसंगीत केवल धुन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति है।
साढ़े तीन दशक की संगीत साधना
चंबा के भरमौर के एक छोटे से गांव में जन्मे कश्मीरी लाल बाद में कांगड़ा के जिया गांव में बस गए। पांच सदस्यीय परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने 35 वर्षों तक लोकसंगीत की साधना की है। पहले वे भगवान शिव को समर्पित भजन गाते थे। जीवनयापन के लिए छोटे-मोटे काम और खेती भी की, लेकिन अंततः उन्होंने तय किया कि संगीत ही उनका रास्ता है।
उनका कहना है कि लोकसंगीत हमारी भाषा, त्योहार और रीति-रिवाजों को जीवित रखता है। यह पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम है। यह इतिहास और समाज का जीवंत दस्तावेज़ है। लोकसंगीत को उसकी मूल शैली में सहेजना ही असली संरक्षण है। आज जब आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक धुनें पीछे छूट रही हैं, तब यह कश्मीरी लाल याद दिलाते हैं कि लोकसंगीत केवल अतीत नहीं, हमारी पहचान है।
पवन डोगरा ने ली है संगीत की शिक्षा
पवन डोगरा बचपन से ही संगीत के प्रति आकर्षित थे। उनकी नानी लोकगीत गाया करती थीं। उन्होंने संगीत में स्नातक किया, पर आर्थिक कारणों से इसे पेशा नहीं बना सके। वर्तमान में वे इग्नू से समाजशास्त्र में परास्नातक कर रहे हैं। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उन्होंने पवन कटोच से ली, लेकिन कश्मीरी लाल से मिलकर पहाड़ी लोकधुनों से गहराई से जुड़ गए।
ढोलक के उस्ताद संजीव
संज़ीव ने 3-4 साल पहले ढोलक बजाना शुरू किया। उनके परिवार में संगीत की परंपरा रही है। उनके मामा, मान सिंह गायक थे और वही उनकी प्रेरणा बने। वे कहते हैं कि संगीत उन्हें खुशी देता है। संजीव चाहता है कि पहाड़ी संगीत अपनी असलियत के साथ जिंदा रहे। लोक की आवाज़ में पहाड़ों की गूंज, मिट्टी की खुशबू और संस्कृति की आत्मा जिंदा रहे।
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