कश्मीर के ज़मलगाम का अनकहा नियम, अपनी पसंद की शादी करनी है तो कुछ साल शिमला से कमाकर लाओ

कश्मीर के ज़मलगाम का अनकहा नियम, अपनी पसंद की शादी करनी है तो कुछ साल शिमला से कमाकर लाओ
कश्मीर के ज़मलगाम का अनकहा नियम, अपनी पसंद की शादी करनी है तो कुछ साल शिमला से कमाकर लाओ
हिमाचल बिजनेस स्पेशल।
कहानी शुरू होती है कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के पास बसे छोटे से गांव ज़मलगाम से, जहां सर्दियों में चहल-पहल और बाकी महीनों में सन्नाटा दिखता है। कारण साफ है कि इस गांव के लगभग 80% मेहनतकश लोग साल के आठ महीने रोजी- रोटी और रोज़गार के लिए हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में रहते हैं।
हर साल होने वाला यह पलायन नया नहीं है, बल्कि पीढ़ियों पुराना है। बताया जाता है कि यहां गांव के लोगों को बेगार करनी पड़ती थी। बेगार से बचने के लिए इस गांव के लोग घाटी से निकलकर पहली बार शिमला पहुंचे थे। उसके बाद वक़्त बदला, शासक बदले, पर इस गांव के लोगों की रोज़ी-रोटी की राह शिमला ही बनी रही।
शिमला की कमाई तो गांव में बच्चों की पढ़ाई
1965 में ग़ुलाम हसन मीर अपने पिता और चाचा के साथ शिमला आए। कुम्हार, चौकीदार, मज़दूर, जो काम मिला, किया। आज उनकी अगली पीढ़ी पर्यटन, होटल, गाइड और कारीगरी जैसे क्षेत्रों में पहचान बना चुकी है। ग़ुलाम नबी गनी रात में होटल रिसेप्शनिस्ट और दिन में गाइड या कुम्हार होते हैं। महीने के 18–20 हज़ार रुपए की कमाई हो जाती है।
दिलचस्प बात यह कि कई कश्मीरी शिमला के स्थानीय निकाय चुनावों में वोट भी डालते हैं। सामुदायिक एकजुटता ने उन्हें सामाजिक-राजनीतिक पहचान दी है। ज़मलगाम में छोटे-छोटे खेत हैं, पर कृषि गुज़ारे लायक भी नहीं। असली सहारा शिमला से भेजी रकम ही होती है। इसी से बच्चों की पढ़ाई, घरों की मरम्मत और बेहतर जीवनशैली संभव हुई है।
सर्दियों में लौटते हैं परिंदे
सर्दियों में जब ‘परिंदे’ लौटते हैं, ज़मलगाम गांव में रौनक लौट आती है। दुकानों के बाहर बैठकर मॉल रोड की चहल-पहल, रात की रोशनी, और बिना डर के घूमने की आज़ादी के किस्से सुनाए जाते हैं।यही कहानियां गांव के युवाओं को प्रेरित करती हैं। एक अनकहा नियम भी है, जो अपनी पसंद की शादी करना चाहता है, कुछ साल शिमला में कमाकर लौटे।
आज शिमला में काम शुरू करने से पहले स्थानीय थाने में पंजीकरण अनिवार्य है। राष्ट्रीय पर्वों पर रोल कॉल भी होती है। कम मुस्लिम आबादी वाले शहर में कश्मीरी मुसलमानों की बड़ी मौजूदगी सावधानी के साथ देखी जाती है। फिर भी, रिश्तों की डोर बनी हुई है। हालांकि बीते कुछ समय से शिमला में कश्मीरियों को लेकर बढ़ते टकराव चिंता की बात है।
कश्मीर का गांव, शिमला से उम्मीद
इस बात में दोराय नहीं कि शिमला कई कश्मीरियों का दूसरा घर बना। उन्होंने स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक ताने-बाने में अपनी जगह बनाई। सूरज ढलते ही ज़मलगाम फिर शांत हो जाता है, पर हर घर में एक सपना जलता है। अगले सीज़न शिमला जाना है, मेहनत करनी है और लौटकर गाँव को और मज़बूत बनाना है।
शिमला में कश्मीरी मजदूरों की संख्या हजारों में है। इनकी संख्या सात- आठ हजार बताई जाती है। शिमला के चढ़ाई वाले रस्तों पर भारी- भरकम समान लेकर चढ़ते- उतरते खान मजदूर देखे जा सकते हैं। वे कुकिंग गैस सिलेन्डर से लेकर गाड़ियों से समान उतारने तक का काम करते शिमला में कई जगह देखे जा सकते हैं।
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Jyoti maurya

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