हिमालय की रियासतों में ‘प्रेत पालु’ की अनसुनी परंपरा, जब राजा मरकर भी राज करता था
हिमालय की रियासतों में ‘प्रेत पालु’ की अनसुनी परंपरा, जब राजा मरकर भी राज करता था
विनोद भावुक। धर्मशाला
राजा मर जाता था, लेकिन उसका राज खत्म नहीं होता था। हिमालय की पुरानी पहाड़ी रियासतों में मृत्यु कोई अंतिम बिंदु नहीं थी। यहाँ राजा के प्राण निकलने के बाद भी सत्ता समाप्त नहीं मानी जाती थी। सत्ता देह में नहीं, आस्था में जीवित रहती थी।जब किसी राजा की साँसें आख़िरी पड़ाव पर होती थीं, तब राज्य के भीतर से नहीं, बल्कि राज्य की सीमा के बाहर से एक व्यक्ति बुलाया जाता था—एक साधारण, निम्न श्रेणी का ब्राह्मण। वह न राजा था, न मंत्री, न सेनापति। लेकिन अगले एक वर्ष तक वही राजा की आत्मा का संवाहक बनता था।
मृत देह के हाथ से भोजन
राजा के प्राण निकलते ही चावल और दूध से बना मीठा भात तैयार किया जाता। उस भात का एक अंश मृत राजा के दाहिने हाथ में रखा जाता। इसके बाद वह ब्राह्मण आगे बढ़ता और मृत देह के हाथ से चम्मच भर-भर कर वह भात ग्रहण करता। हर चम्मच के बदले उसे पंद्रह रुपये का दान दिया जाता।
यह धन नहीं था— यह उस विश्वास का मूल्य था जिसमें माना जाता था कि राजा की आत्मा अब उसी देह में प्रवाहित हो रही है।
एक वर्ष का जीवित राजा
इसके बाद उस ब्राह्मण को मृत राजा के वस्त्र पहनाए जाते, राजकीय आभूषण दिए जाते, एक तलवार, एक पालकी और एक घोड़ा सौंपा जाता। राजमहल की रसोई अब उसके लिए खुल जाती। राजा के निजी सेवक अब उसके सेवक बन जाते। कई रियासतों में उसे “राजा” कहकर संबोधित किया जाता।
लेकिन एक सीमा तय थी—वह महल या निर्धारित भवन से बाहर नहीं जा सकता था, सिवाय उन अवसरों के जब मृत राजा की आत्मा की शांति के लिए मंदिरों में विशेष पूजा होती। पूरे एक वर्ष तक राजा की आत्मा के नाम पर जो भी भोग चढ़ाया जाता, वह उसी ब्राह्मण को दिया जाता।
प्रेत पालु : आत्मा का वाहक
इस ब्राह्मण को कहा जाता था— प्रेत पालु। प्रेत यानी अधूरी आत्मा, और पालु यानी पालन करने वाला।
मान्यता थी कि मीठे भात के माध्यम से मृत राजा की आत्मा उस ब्राह्मण के शरीर में प्रवेश कर जाती है। राजा मर चुका होता था, लेकिन उसकी आत्मा उस देह में राज करती थी। इसलिए जो सम्मान मिलता, वह व्यक्ति को नहीं, राजा की आत्मा को होता था।
अंतिम भोज और राज्य से विदाई
मृत्यु की पहली बरसी पर अंतिम भोज होता— जिसे हर्षदान कहा जाता था। सुबह वह भोजन करता, और उसी दिन दोपहर बाद राजकीय सम्मान के साथ उसे राज्य की सीमा तक छोड़ा जाता। वह स्वयं घोड़े पर सवार होता। राज्य के उच्च अधिकारी पैदल उसके पीछे चलते। रास्ते में उस पर तांबे के सिक्के लुटाए जाते। लेकिन उसे घोड़े से उतरने की अनुमति नहीं होती। मान्यता थी कि यदि वह घोड़े से उतर गया, तो मृत राजा की आत्मा उस भूमि पर अब भी शासन करती रहेगी।
सीमा पार, वापसी निषिद्ध
सूर्यास्त से पहले उसे राज्य की सीमा पार कराई जाती। सेना यह सुनिश्चित करती कि वह न रुके, न उतरे, और न पीछे मुड़े। सीमा पार करते ही उसका राजा होना समाप्त हो जाता। और वह फिर कभी उस राज्य में लौट नहीं सकता था।
चंबा में रावी पार करते ही अंत
चंबा रियासत में यह परंपरा कुछ अलग रूप में थी। श्मशान घाट पर ही चावल-दूध की रस्म होती, और उसी दिन ब्राह्मण को रावी नदी पार करा दी जाती। रावी पार करना राज्य से निष्कासन माना जाता था। वह फिर कभी चंबा नहीं लौट सकता था।
इतिहास की किताब से निकली, लोक-स्मृति में दर्ज
इस रहस्यमयी परंपरा का विवरण ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी एच. डब्ल्यू. एमर्सन (I.C.S.) ने संकलित किया। यह विवरण विश्वविख्यात मानवशास्त्री जेम्स जॉर्ज फ़्रेज़र की प्रसिद्ध कृति The Golden Bough के अध्याय “The Dying God” में दर्ज है।
यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि हिमालयी रियासतों के सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज़ी प्रमाण है।
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