कला की दुनिया : हिमालय को पोस्टकार्ड से भी छोटे कैनवास पर विराट रूप में उतारने का हुनर, कोलकाता के बीरेश्वर सेन ने नग्गर में सीखा

कला की दुनिया : हिमालय को पोस्टकार्ड से भी छोटे कैनवास पर विराट रूप में उतारने का हुनर, कोलकाता के बीरेश्वर सेन ने नग्गर में सीखा
कला की दुनिया : हिमालय को पोस्टकार्ड से भी छोटे कैनवास पर विराट रूप में उतारने का हुनर, कोलकाता के बीरेश्वर सेन ने नग्गर में सीखा
विनोद भावुक। कुल्लू
कोलकाता के बीरेश्वर सेन ऐसे चित्रकार थे, जिनकी तूलिका में पहाड़ों की ख़ामोशी, घाटियों का अकेलापन और प्रकृति का आध्यात्मिक स्वर एक साथ बोलता है। बंगाल स्कूल ऑफ पेंटिंग्स के के इस चित्रकार ने हिमालय को पोस्टकार्ड से भी छोटे कैनवास पर विराट रूप में उतारने का हुनर नग्गर में सीखा था।
आज से 94 साल पहले साल 1932 का वर्ष बीरेश्वर सेन के जीवन में निर्णायक साबित हुआ, जब वे हिमालय की यात्रा पर कुल्लू घाटी के नग्गर पहुंचे। नग्गर उस समय रूसी चित्रकार एवं दार्शनिक निकोलस रोरिख की कर्मभूमि था। सेन और रोरिख की दो दृष्टियों, दो संस्कृतियों और दो आत्मिक यात्राओं का संवाद था।
कला और आत्मा का मिलन
नग्गर से बीरेश्वर सेन की चित्रकला में हिमालय सिर्फ़ एक भौगोलिक संरचना नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक सत्ता बन गया। बीरेश्वर सेन की पेंटिंग की सबसे बड़ी विशेषता थी पोस्टकार्ड से भी छोटे आकार में बनाए गए लैंडस्केप, जिनमें बर्फ़ से ढकी चोटियां, सूनी घाटियां, दूर तक फैला आकाश, मनुष्य की अनुपस्थिति में भी उसकी अनुभूति झलकती है।
उनकी वॉटरकलर पेंटिंग्स में नग्गर और हिमालय विशाल होते हुए भी मौन दिखाई देता हैं। कला इतिहासकार बी.एन. गोस्वामी लिखते हैं कि बेशक विरेश्वर सेन रोरिख की कला साधना से प्रेरित थे, लेकिन उनकी कला की नदी किसी और स्रोत से बहती थी। रोरिख नग्गर में बसे हुए थे और हिमालय उनके जीवन का केंद्र था, लेकिन बीरेश्वर सेन ने उनकी शैली की नकल नहीं की।
शौक जो बन गया जुनून
ब्रिटिश राज के दौरान साल 1897 में कोलकाता के राय बहादुर शेलेश्वर सेन के घर जन्में विरेश्वर को बचपन से ही चित्रकला का शौक था, लेकिन उन्होंने पेंटिंग की पढ़ाई के बजाए प्रेजिडेन्सी कॉलेज कोलकाता से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया किया और 1923 में बिहार नेशनल कॉलेज पटना के प्रोफेसर बने।
कॉलेज में अध्यापन के साथ पेंटिंग का सिलसिला जारी रहा। वे रवीन्द्र नाथ टैगोर के संपर्क में आए और नंदलाल बॉस की इंडियन सोसायटी ऑफ ओरिएंट आर्ट से से चित्रकला का प्रशिक्षण लिया। 1932 में हिमालय की यात्रा ने उनकी चित्रकला का नया फ़लक दिया, जब वे हिमालय से मिलने नग्गर पहुंचे।
भूले कलाकार की तलाश
अपने जीवनकाल में चर्चित चित्रकार रहे बीरेश्वर सेन 1974 में निधन के बाद धीरे-धीरे स्मृतियों से ओझल हो गए, लेकिन 2010 में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, दिल्ली में ‘स्वर्ग और धरती : हिमालय और बिरेश्वर सेन की कला’ शीर्ष से आयोजित प्रदर्शनी ने उन्हें फिर से चित्रकला के केंद्र में ला खड़ा किया।
इसके बाद साल 2016 में अमेरिका के डलास और 2017 में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, दिल्ली में उनकी 80 कृतियों की प्रदर्शनी आयोजित की गई। इस जरिये नग्गर की घाटियों से उपजी कला को दुनिया ने फिर पहचाना। बीरेश्वर सेन की कला यह याद दिलाती है कि सबसे विशाल सच, सबसे छोटे कैनवास पर उतरता है।
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Jyoti maurya

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