कुछ किरदार ऐसे भी होते है जिनका योगदान इतिहास में दफन होकर रह जाता है और हमारी पीढ़ियां उनके योगदान से अनभिज्ञ रह जाती हैं । उनके योगदान को या तो अनभिज्ञता के कारण या किसी साजिश के तहत नीचा करके दिखाया जाता है । ऐसी ही शख्सियत कांगड़ा जिला के नूरपुर क्षेत्र से संबंधित थी , नाम था बक्शी टेक चंद जिनके शैक्षिक , सार्वजनिक , और विधिक योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1930 में सर की उपाधि से अलंकृत किया ।
कुछ किरदार ऐसे भी होते है जिनका योगदान इतिहास में दफन होकर रह जाता है और हमारी पीढ़ियां उनके योगदान से अनभिज्ञ रह जाती हैं । उनके योगदान को या तो अनभिज्ञता के कारण या किसी साजिश के तहत नीचा करके दिखाया जाता है । ऐसी ही शख्सियत कांगड़ा जिला के नूरपुर क्षेत्र से संबंधित थी , नाम था बक्शी टेक चंद जिनके शैक्षिक , सार्वजनिक , और विधिक योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1930 में सर की उपाधि से अलंकृत किया ।
विनोद भावुक। नूरपुर
सर टेक चंद बक्शी का जन्म 26 अगस्त 1883 को कांगड़ा जिला के जसूर गांव में बक्शी जैसी राम के घर हुआ । 17 वर्ष की अल्पायु में माता पिता का साया उनके ऊपर से उठ गया । उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शासकीय विद्यालय नूरपुर से प्राप्त की। तत्पश्चात राजकीय महाविद्यालय लाहौर से स्नातक और यूनिवर्सिटी लॉ कॉलेज लाहौर से LLB की डिग्री प्राप्त की । वे पक्के राष्ट्रवादी थे और जलियांवाला हत्याकांड में मरे गए लोगों के परिजनों को उन्होंने पेंशन और आर्थिक सहायता करने में बहुत अधिक कोशिश की । सर टेक चंद बक्शी को संविधान सभा के सदस्य और भारत पाक विभाजन की बाउंड्री कमीशन के सदस्य चुने जाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ जो न केवल बक्शी परिवार अपितु पूरे हिमाचल की प्रतिष्ठा को चार लगा देता है ।
और इसके साथ ही वे ब्रिटिश काल में पंजाब सरकार में लॉ मेंबर के रूप कार्यरत रहे जबकि यह सम्मान जस्टिस मेहरचंद महाजन को भी नसीब न हुआ था । सर टेक चंद बक्शी ने लाहौर हाई कोर्ट के जज के रूप भी सेवाएं दी । तत्पश्चात वे पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर के उपकुलपति भी रहे । 1950 में वे पेटेंट इंक्वायरी कमेटी के पहले अध्यक्ष बने । जम्मू कश्मीर सरकार के संविधान लिखने में सर टेकचंद बक्शी ने अग्रणी भूमिका निभाई ।
बक्शी टेक चंद एक महान शिक्षाविद् थे। उन्होंने उच्च शिक्षा में कई प्रशासनिक व शैक्षणिक सुधार किए। उन्होंने आधुनिक, नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा पर बल दिया। कन्या शिक्षा के समर्थक के रूप में उन्होंने बालिका विद्यालयों की स्थापना और संरक्षण किया। वे आर्य समाज की विचारधारा से प्रभावित थे और उन्होंने कन्या शिक्षा पर विशेष वल दिया , इसी कारण DAV संस्थाओं के विस्तार और शैक्षिक योगदान में उनकी भूमिका अग्रणी रहती थी । उन्होंने उत्तर भारत में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कन्या शिक्षा के लिए नूरपुर में अपने पुश्तैनी घर को शिक्षा विभाग को दान करके नूरपुर में बक्शी टेकचंद कन्या विद्यालय खोलने का मार्ग प्रशस्त किया । उनकी मृत्यु 28 अगस्त 1962 को हो गई ।
शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए DAV संस्था ने 1990 में चंबा बनीखेत में एक डिग्री कॉलेज की स्थापना की । राष्ट्रभक्ति और समाजसेवा का जज्बा उनके दत्तक पुत्र रणजीत बक्शी में भी दिखा जिन्होंने 22 वर्ष तक भारतीय नौसेना में और बाद में उन्हें नूरपुर का विधायक होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उन्हीं के नक्शेकदम पर चलते उनकी तीसरी पीढ़ी में अकिल बक्शी भी एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में चयनित हुए और अब नूरपुर में समाजसेवा के क्षेत्र में एक अग्रणी नाम है । समाजसेवा के साथ साथ वह नूरपुर की राजनीति में भी एक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं ।
ऐसी महान विभूतियों नूरपुर ही नहीं , समूचा हिमाचल गर्व महसूस करता है ।
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