धर्मशाला के दो दोस्तों ने केस लड़ने के लिए चन्दा जुटाया, भटियात के आठ साल के दिव्यांग को सुप्रीम कोर्ट से मुआवजा दिलवाया
धर्मशाला के दो दोस्तों ने केस लड़ने के लिए चन्दा जुटाया, भटियात के आठ साल के दिव्यांग को सुप्रीम कोर्ट से मुआवजा दिलवाया
सौरभ कौंडल। धर्मशाला
चंबा जिले के भटियात क्षेत्र से संबन्धित मुआवजे के केस से संबन्धित सुप्रीम कोर्ट में जीत सिर्फ़ एक मुक़दमे की जीत नहीं है, बल्कि हौसले, सामाजिक जिम्मेदारी और न्याय पर विश्वास की जीवंत मिसाल है। एक ऐसा बच्चा, जिसने महज़ आठ साल की उम्र में अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष झेला और फिर भी हार नहीं मानी।
18 मार्च 2012 को भटियात का आठ वर्षीय नवल किशोर अपनी मां के साथ खेत में साग तोड़ रहा था। तभी ऊपर से गुजर रही 11 केवी हाईटेंशन लाइन (लाहडू–चोवाड़ी लाइन) की चपेट में आकर वह बुरी तरह झुलस गया और बेहोश हो गया। इलाज के दौरान उसकी जान तो बच गई, लेकिन दोनों हाथ काटने पड़े। यह हादसा उसे 100 प्रतिशत दिव्यांग बना गया।
समाजसेवी बने असली नायक
इस त्रासदी के बाद परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुका था। न तो मीडिया तक पहुंच थी, न अदालतों की समझ। ऐसे वक्त में धर्मशाला के समाजसेवी स्वर्गीय एस.एस. गुलेरिया और नरेश ठाकुर आगे आए और यहीं से इस लड़ाई ने नई दिशा ली। पीड़ित परिवार की आवाज़ मीडिया तक पहुंचाई कानूनी लड़ाई के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
केस लड़ने के लिए समाज के दानदाताओं को जोड़कर मानवीय सहयोग जुटाया। अगर ये दोनों समाजसेवी आगे न आते, तो शायद यह परिवार कभी न्याय तक पहुंच ही न पाता। पहले मामला हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय, शिमला पहुंचा। हाईकोर्ट ने बच्चे को 1.25 करोड़ मुआवज़ा देने का आदेश दिया, पर तत्कालीन राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी।
एस.एस. गुलेरिया और नरेश ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी की। न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति अभय मोहन सप्रे वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर 90 लाख मुआवज़ा देने का निर्देश दिया।
सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले लोग बदलाव ला सकते हैं। गरीब और असहाय की आवाज़ बनने वाला एक इंसान भी सिस्टम हिला सकता है। सुरक्षा में लापरवाही करने वालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
नवल किशोर की जीत हर उस परिवार के लिए उम्मीद है, जो व्यवस्था से हार मानने को मजबूर हो जाता है और हर उस समाजसेवी के लिए प्रेरणा, जो बिना स्वार्थ किसी का हाथ थाम लेता है।
(लेखक जिला एवं सत्र न्यायलय कांगड़ा स्थित धर्मशाला में अधिवक्ता हैं)
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/attack-on-the-environment-minister-of-the-government-of-india-over-river-encroachment-fight-becomes-a-milestone-for-environmental-law-in-the-supreme-court/
