दो सौ साल पहले हिमालयी दुनिया का प्रवेशद्वार था रोहतांग, लद्दाख, तिब्बत और बुखारा तक खुलती राह, 1820 में मूरक्रॉफ्ट ने घोड़ों की तलाश में पार किया था रोहतांग दर्रा

दो सौ साल पहले हिमालयी दुनिया का प्रवेशद्वार था रोहतांग, लद्दाख, तिब्बत और बुखारा तक खुलती राह, 1820 में मूरक्रॉफ्ट ने घोड़ों की तलाश में पार किया था रोहतांग दर्रा
दो सौ साल पहले हिमालयी दुनिया का प्रवेशद्वार था रोहतांग, लद्दाख, तिब्बत और बुखारा तक खुलती राह, 1820 में मूरक्रॉफ्ट ने घोड़ों की तलाश में पार किया था रोहतांग दर्रा
विनोद भावुक। रोहतांग
अटल टनल के बन जाने के बाद अब लाहौल और लेह जाने वालों के लिए रोहतांग दर्रा पार नहीं करना पड़ता। अब केवल रोमांच के शौकीन की इस रास्ते से होकर गुजरते हैं, लेकिन कभी यही दर्रा हिमालयी दुनिया का प्रवेशद्वार था। लेह- लद्दाख, तिब्बत और बुखारा जाने के लिए इसी दर्रे से होकर गुजरना होता था।
दो सौ साल पहले 1820 में ईस्ट इंडिया कंपनी के पशु चिकित्सक और खोजकर्ता मूरक्रॉफ्ट ने अच्छी नस्ल के घोड़ों की तलाश में पगडंडियों से होकर बर्फ़ीले तूफ़ान और जानलेवा ठंड के बीच 13,300 फीट ऊंचा यह दर्रा पार किया तो उनकी यह हिमालयी यात्रा इतिहास बन गई। दो सदी बीत जाने के बावजूद इस यात्रा को आज भी याद किया जाता है।
एशिया की राजनीति, व्यापार और जासूसी के तार
रोहतांग दर्रा केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, ऐतिहासिक रास्ता भी है, जिसके साथ उन्नीसवीं सदी में एशिया की राजनीति, व्यापार और जासूसी के तार जुड़े हैं। इस दर्रे से होकर विलियम मूरक्रॉफ्ट का गुजरना केवल घोड़ों की तलाश भर नहीं थी। वे मध्य एशिया तक व्यापार की संभावना तलाशने वाले ‘ग्रेट गेम’ के शुरुआती पात्रों में से एक थे।
पीटर होपक्रिक की पुस्तक, ‘द ग्रेट गेम: ऑन सेक्रेट सर्विस इन हाई एशिया’ में लिखते हैं कि मूरक्रॉफ्ट का घोषित लक्ष्य बेशक बेहतर नस्ल के घोड़ों की तलाश था, लेकिन उनकी यात्रा का असली महत्व इससे कहीं बड़ा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें खुफ़िया सूचनाएं जुटाने के लिए के लिए इस यात्रा पर भेजा था।
यूरोप के लिए हिमालय में प्रवेश
1841 में संपादित ‘ट्रेवल्स इन द हिमालयन प्रोविन्स ऑफ हिंदुस्तान एंड द पंजाब’ में एचएच विल्सन लिखते हैं कि मूरक्रॉफ्ट की रोहतांग पार कर लद्दाख पहुंचने का यह कारनामा दुसाहस का काम था। उनकी इस यात्रा के बाद ही रोहतांग एशिया के व्यापार मार्गों का हिस्सा रहा और औपनिवेशिक रणनीति का प्रवेश द्वार बना।
रोहतांग को पार कर लद्दाख और आगे मध्य एशिया तक यह पहुंचाना, सब उस दौर में ब्रिटिश रणनीति के लिए बेहद अहम था। इस यात्रा से ही यूरोप के लिए अब तक बंद रहे हिमालय के दरवाजे खोलने की अनूठी पहल हुई, जो आगे व्यापार के लिए नींव का पत्थर साबित हुई और अंग्रेज़ हिमालय तक बढ्ने के कामयाब हुये।
लद्दाख की ओर पहला क़दम
रोहतांग से उतरते ही मूरक्रॉफ्ट की टोली लाहौल घाटी में दाख़िल हुई और फिर लेह पहुंची। लद्दाख में उन्होंने स्थानीय शासन से व्यापार समझौते की कोशिश की। हालांकि यह कदम कंपनी को नागवार गुज़रा। उस दौर में रोहतांग पार करना ही सबसे बड़ा निर्णायक मोड़ था, जिसने इस अभियान को ऐतिहासिक बना दिया।
आज रोहतांग को हम पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य से जोड़ते हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि रोहतांग दर्रा ऐसे खोजकर्ताओं का साक्षी रहा, जिन्होंने हिमालय को विश्व मानचित्र पर नई जगह दी और यह दर्रा ब्रिटिश औपनिवेशिक रणनीति का प्रवेश द्वार बना। यह दर्रा केवल पहाड़ नहीं, इतिहास का जीवित अध्याय है, जहां साहस, ज्ञान और राजनीति एक-दूसरे से टकराते हैं।
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Jyoti maurya

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